Transliteration: (Fa aati zal qurbaa haqqahoo walmiskeena wabnassabeel; zaalika khairul lil lazeena yureedoona Wajhal laahi wa ulaaa'ika humul muflihoon)
"पस क़रीबी रिश्तेदार को उसका हक़ दो [81], और मिस्कीन और मुसाफ़िर को भी [82]; यह उन लोगों के लिए बेहतर है जो अल्लाह की रज़ा चाहते हैं, और वही लोग फ़लाह (कामयाबी) पाने वाले हैं [83]।"
यह आयत ईमान वालों को हुक्म देती है कि क़रीबी रिश्तेदारों के हुक़ूक़ पूरी तरह अदा करें।
हर रिश्तेदार का एक हक़ मुक़र्रर है, जैसा कि इस्लामी फ़िक़्ह में तफ़सील से बयान हुआ है, और इसमें ख़ूनी रिश्तेदार और सुसराल वाले दोनों शामिल हैं।
रिश्तेदारों का एहतराम और हुक़ूक़ की अदायगी सिर्फ़ सामाजी अख़लाक़ नहीं बल्कि एक इलाही फ़रीज़ा है।
यह हुक्म मिस्कीनों और मुसाफ़िरों तक फैला हुआ है, और ईमान वालों को मेहमानी, हमदर्दी और माली इमदाद की तरग़ीब देता है।
इस ख़याल रखने में सफ़र की मुश्किलात के दौरान खाना, पनाह और हर तरह की मदद मुहैया करना शामिल है।
ये नेकी के काम रस्मी दस्तूर या सामाजी शोहरत के लिए नहीं होने चाहिए, बल्कि ख़ालिस अल्लाह की रज़ा हासिल करने की नीयत से होने चाहिए।
सिर्फ़ यही ख़ुलूस सवाब की ज़मानत देता है, और अल्लाह के नज़दीक यही लोग हक़ीक़ी तौर पर कामयाब होने वाले हैं।
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