Transliteration: (Wa maaa aataitum mir ribal li yarbuwa feee amwaalin naasi falaa yarboo 'indal laahi wa maaa aataitum min zaakaatin tureedoona wajhal laahi fa ulaaa'ika humul mud'ifoon)
"और जो सूद तुम देते हो ताकि वह लोगों के मालों में मिलकर बढ़ जाए, तो वह अल्लाह के नज़दीक नहीं बढ़ता [84]; और जो ज़कात तुम अल्लाह की रज़ा की तलब में देते हो [85], तो ऐसे ही लोग (अपना माल) कई गुना बढ़ाने वाले हैं [86]।"
यहाँ रिबा (सूद) अपने लुग़वी (शाब्दिक) मफ़हूम में इस्तेमाल हुआ है, शरई मफ़हूम में नहीं। इससे मुराद वे तोहफ़े या हदियात हैं जो इस नीयत से दिए जाएं कि बदले में उससे बड़ा तोहफ़ा मिलेगा।
अगरचे ऐसा करना जायज़ है, लेकिन ऐसी नीयत पर अल्लाह के यहाँ कोई सवाब नहीं मिलता, क्योंकि यह कारोबारी लेन-देन है, रूहानी अमल नहीं।
हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ को ऐसी नीयत से तोहफ़ा देने से ख़ास तौर पर मना फ़रमाया गया था। जैसा कि अल्लाह ने फ़रमाया: “और एहसान न करो ज़्यादा पाने की नीयत से” (सूरह अल-मुद्दस्सिर, 74:6)।
हक़ीक़ी तोहफ़ा वह है जो सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा के लिए दिया जाए, दुनियावी बदले के लिए नहीं।
यहाँ ज़कात (ख़ैरात) से मुराद वह माल है जो उनकी ग़रीबी को देखते हुए ख़ालिस अल्लाह की रज़ा के लिए ग़रीबों को दिया जाए।
अगर मालदार को दिया जाए तो वह तोहफ़ा बन जाता है, ज़कात या सदक़ा नहीं। फ़र्ज़ ज़कात ख़ास तौर पर ग़रीबों और मिस्कीनों का हक़ है, और नफ़्ली सदक़ा भी उन्हीं को देना अफ़ज़ल है।
यह आयत वादा फ़रमाती है कि जो सदक़ा सच्ची नीयत से दिया जाता है, अल्लाह उसमें कई गुना बरकत अता फ़रमाता है।
अगरचे यह इज़ाफ़ा दोगुना या उससे भी ज़्यादा हो सकता है, लेकिन यह आयत दूसरी आयात के ख़िलाफ़ नहीं जहाँ बेहिसाब सवाब का ज़िक्र है—यह आयत बस यह समझाती है कि हक़ीक़ी मुनाफ़ा वह है जो अल्लाह के पास बढ़ता है, न कि दुनिया का ज़ाहिरी नफ़ा।
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