Transliteration: (Zaharal fasaadu fil barri wal bahri bimaa kasabat aydinnaasi li yuzeeqahum ba'dal lazee 'amiloo la'allahum yarji'oon)
"ख़ुश्की और तरी (समंदर) में फ़साद फैल गया है उन बुराइयों के बाइस जो लोगों के हाथों ने कमाई हैं [90], ताकि वह उन्हें उनके बाज़ आमाल का मज़ा चखाए [91] ताकि वे बाज़ आ जाएं (तौबा कर लें) [92]।"
कुफ़्र और आम गुनाहों की कसरत की वजह से तरह-तरह की ख़राबियाँ और फ़साद—जैसे क़हत, बीमारियाँ, सैलाब, सूखा और मुसीबतें—ज़मीन और समंदर दोनों में ज़ाहिर हो जाते हैं।
यहाँ तक कि समंदर के जानवर भी मुतास्सिर होते हैं, जैसे सीपियों में मोती नहीं बनते और आलूदगी या बारिश की कमी की वजह से मछलियाँ अंधी हो जाती हैं।
इसी तरह जंगल और दरख़्त सूख जाते हैं और दरिया सिमट जाते हैं—यह सब इंसानों के बुरे आमाल का नतीजा है।
ये आफ़ात इंसानी आमाल के बुरे नतीजों का एक छोटा सा मज़ा हैं।
कुछ सख़्तियाँ दुनियावी सज़ा होती हैं, जबकि असल और शदीद अज़ाब आख़िरत में इंतज़ार कर रहा है।
या इसका मफ़हूम यह भी हो सकता है कि अल्लाह बहुत से गुनाहों को मुआफ़ फ़रमा देता है, लेकिन चंद गुनाहों पर सज़ा देता है, ताकि लोग ग़ौर करें और तौबा की तरफ़ लौटें।
ये परेशानियाँ एक इलाही तंबीह हैं ताकि लोग तौबा और रुजूअ करें।
कभी-कभी इंसानी गुनाहों की वजह से बेज़बान जानवर भी तकलीफ़ उठाते हैं, जिस तरह मासूम जानवरों की मौजूदगी की वजह से बारिश जैसी रहमतें नाज़िल होती हैं।
तफ़सीर रूहुल मआनी में है कि ज़िना की कसरत हलाकत लाती है, ज़कात न देना क़हत लाता है, नाप-तौल में कमी ज़ालिम हुक्मरानों को मुसल्लत करती है, और सूदख़ोरी से ज़लज़ले आते हैं।
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