कुरान - 30:42 सूरह अर-रूम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

42
قُلۡ سِيرُواْ فِي ٱلۡأَرۡضِ فَٱنظُرُواْ كَيۡفَ كَانَ عَٰقِبَةُ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلُۚ كَانَ أَكۡثَرُهُم مُّشۡرِكِينَ

Transliteration: (Qul seeroo fil ardi fanzuroo kaifa kaana 'aaqibatul lazeena min qabl; kaana aksaruhum mushrikeen)

आप कह दीजिए, 'ज़मीन में सैर करो और देखो [93] कि उन लोगों का कैसा अंजाम हुआ जो तुमसे पहले थे; उनमें से अक्सर मुशरिक थे [94]।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अर-रूम आयत 42 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अर-रूम तफ़सीर - आयत 42

"आप कह दीजिए, 'ज़मीन में सैर करो और देखो [93] कि उन लोगों का कैसा अंजाम हुआ जो तुमसे पहले थे; उनमें से अक्सर मुशरिक थे [94]।'"

[93] सैर व सियाहत से इबरत हासिल करना

"ज़मीन" से मुराद पिछली क़ौमों के इलाक़े हैं जो इलाही अज़ाब की वजह से तबाह हुए। अहले मक्का अपनी तिजारत के सफ़रों में अक्सर इन मक़ामात से गुज़रते थे।
यहाँ "देखने" से मुराद बसीरत और इबरत की नज़र से देखना है, महज़ आँखों से तमाशा देखना नहीं। मक़सद यह है कि जिन्होंने हक़ को झुठलाया उनके मलबों और ख़राब हाल से सबक़ हासिल किया जाए।

[94] पिछली क़ौमों का अंजाम

यहाँ "अक्सर" से मुराद तमाम मुजरिम हैं, जो यह ज़ाहिर करता है कि पिछली क़ौमों के अक्सर लोग शिर्क पर अड़े रहकर ही हलाक हुए।
इससे यह सबक़ मिलता है कि इबरत हासिल करने और अल्लाह का ख़ौफ़ दिल में पैदा करने की नीयत से सफ़र करना इबादत है।
इसी तरह, बुज़ुर्गाने दीन और औलिया-ए-किराम के मज़ारात की ज़ियारत करना ताकि दिल में इबादत का शौक़ और उम्मीद पैदा हो, एक नेक और मुस्तहसन अमल है। पस, यह आयत मुक़द्दस मक़ामात की ज़ियारत और उर्स की महफ़िलों में शिरकत की ताईद करती है।

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