Transliteration: (Awalam yaraw annal laaha yabsutur rizqa limai yashaaa'u wa yaqdir; inna fee zaalika la Aayaatil liqawminy yu'minoon)
"क्या उन्होंने नहीं देखा कि अल्लाह जिसके लिए चाहता है रिज़्क़ कुशादा करता है और जिसके लिए चाहता है तंग करता है? बेशक इसमें ईमान लाने वाले लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ हैं [80]।"
यह आयत इस हक़ीक़त को वाज़ेह करती है कि अल्लाह ही अकेला राज़िक़ है—वह जिसके लिए चाहता है रिज़्क़ फ़राख़ करता है, और जिसके लिए चाहता है तंग कर देता है, अपनी हिकमत और इल्म की बुनियाद पर।
कुछ लोगों को दौलत उनकी नेकी की वजह से नहीं दी जाती, और दूसरों को तंगदस्ती उनके गुनाहों की वजह से नहीं मिलती।
रिज़्क़ की यह कमी-बेशी शुक्र और सब्र की आज़माइश है।
ईमान वालों के लिए ये तबदीलियाँ अल्लाह की क़ुदरत, हिकमत और मुतलक़ इख़्तियार की वाज़ेह निशानियाँ हैं।
वे समझते हैं कि हक़ीक़ी रिज़्क़ रूहानी और दायमी है, और माली दौलत आरज़ी और आज़माइश पर मब्नी है।
पस, यह आयत इस ग़लतफ़हमी को दूर करती है कि दौलत का होना मक़बूलियत की दलील है या ग़रीबी अल्लाह की नाराज़गी की अलामत है, और ईमान वालों को अल्लाह की तदबीर पर कामिल भरोसा रखने की तालीम देती है।
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