Transliteration: (Muneebeena ilaihi wattaqoohu wa aqeemus Salaata wa laa takoonoo minal mushrikeen)
"उसी की तरफ़ रुजूअ (तौबा) करते हुए [67], और उससे डरो और नमाज़ क़ायम करो [68], और मुशरिकीन में से न हो जाओ [69];"
इसका मफ़हूम यह है कि ख़ालिस नीयत के साथ अल्लाह की तरफ़ रुजूअ करो, तमाम नाफ़रमानियों और कुफ़्र को पीछे छोड़ते हुए।
इसका यह भी तक़ाज़ा है कि इंसान पूरी तरह फ़रमांबरदार हो जाए और तौबा व इस्तिग़फ़ार को अपनी रोज़मर्रा ज़िंदगी का लाज़िमी हिस्सा बना ले।
इससे मुराद पाबंदी के साथ नमाज़ अदा करना है, सिर्फ़ ज़ाहिरी अरकान के तौर पर नहीं बल्कि ख़ुलूस, वक़्त की पाबंदी और हुज़ूरी-ए-क़ल्ब के साथ।
नमाज़ इताअत की रूह और अल्लाह की हक़ीक़ी बंदगी का सबसे बड़ा निशान है।
शिर्क की तमाम क़िस्मों से परहेज़ करो, चाहे वह अक़ीदे में हो, इबादत में हो, या आमाल में।
इसमें बुतपरस्ती, अल्लाह के साथ किसी को शरीक ठहराना, या शिर्क करने वालों की मुशाबहत (नक़ल) से दूर रहना शामिल है।
यह आयत एक सच्चे मोमिन की बुनियादी सिफ़ात को उजागर करती है: तौबा, तक़वा (अल्लाह का ख़ौफ़), नमाज़ और ख़ालिस तौहीद।
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