कुरान - 30:45 सूरह अर-रूम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

45
لِيَجۡزِيَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّـٰلِحَٰتِ مِن فَضۡلِهِۦٓۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلۡكَٰفِرِينَ

Transliteration: (Li yajziyal lazeena aamanoo wa 'amilus saalihaati min fadlih; innahoo laa yuhibbul kaafireen)

ताकि वह अपने फ़ज़्ल से उन लोगों को बदला दे [100] जो ईमान लाए और उन्होंने नेक अमल किए; बेशक वह काफ़िरों को पसंद नहीं फ़रमाता [101]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अर-रूम आयत 45 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अर-रूम तफ़सीर - आयत 45

"ताकि वह अपने फ़ज़्ल से उन लोगों को बदला दे [100] जो ईमान लाए और उन्होंने नेक अमल किए; बेशक वह काफ़िरों को पसंद नहीं फ़रमाता [101]।"

[100] अल्लाह के फ़ज़्ल से अज्र व सवाब

यह आयत वाज़ेह करती है कि किसी भी नेक अमल का सवाब मुकम्मल तौर पर अल्लाह तआला के फ़ज़्ल व करम पर मौक़ूफ़ है। नेक आमाल सिर्फ़ सवाब का ज़रिया और सबब बनते हैं, लेकिन हक़ीक़ी सवाब अल्लाह का फ़ज़्ल है।
लिहाज़ा किसी को अपने आमाल पर ग़ुरूर नहीं करना चाहिए। साथ ही, ईमान आमाल से पहले है, क्योंकि आयत में नेक आमाल से पहले ईमान का ज़िक्र फ़रमाया गया।

[101] काफ़िरों से अल्लाह की नाराज़गी

अल्लाह तआला काफ़िरों से नाराज़ है, और इस नाराज़गी की बिना पर वह उन्हें सख़्त अज़ाब देगा।
अल्लाह की मुहब्बत न होने का मतलब उसकी नाराज़गी और ग़ज़ब है, जो उनके इंकार और कुफ़्र का लाज़िमी नतीजा है।

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