Transliteration: (Fa innaka laa tusmi'ul mawtaa wa laa tusmi'us summad du'aaa'a izaa wallaw mudbireen)
"पस बेशक आप न मुर्दों को सुना सकते हैं [117] और न बहरों को अपनी पुकार सुना सकते हैं जब वे पीठ फेर कर भाग रहे हों;"
यहाँ मुर्दे से मुराद जिस्मानी तौर पर मरे हुए लोग नहीं हैं, बल्कि वे लोग हैं जिन्होंने अपनी ज़िंदगी का हक़ीक़ी मक़सद पूरा नहीं किया — वे ज़ाहिरी ज़िंदगी के बावजूद रूहानी तौर पर मुर्दा हैं। इसके बरअक्स, ज़िंदा वे हैं जिन्होंने ज़िंदगी का मक़सद पा लिया, चाहे वे जिस्मानी तौर पर वफ़ात पा चुके हों (जैसे शुहदा-ए-किराम)।
जिस तरह किसी जिस्मानी मुर्दे को कोई दवा फ़ायदा नहीं पहुँचा सकती, उसी तरह इन रूहानी तौर पर मुर्दा काफ़िरों को कोई नसीहत या हिदायत नफ़ा नहीं देती। यह आयत इस बात का इंकार नहीं करती कि क़ब्रों के मुर्दे सुन नहीं सकते; बल्कि यह काफ़िरों की हठधर्मी और नसीहत क़बूल न करने की सलाहियत के ख़त्म होने को बयान करती है।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat