Transliteration: (Allahul lazee khalaqa kum min du'fin summa ja'ala mim ba'di du'fin quwwatan summa ja'ala mim ba'di quwwatin du'fanw wa shaibah; yakhluqu maa yashaaa'u wa Huwal 'Aleemul Qadeer)
"अल्लाह ही है जिसने तुम्हें कमज़ोरी की हालत में पैदा किया [120], फिर कमज़ोरी के बाद क़ुव्वत (ताक़त) अता की [121], फिर ताक़त के बाद कमज़ोरी और बुढ़ापा पैदा किया [122]; वह जो चाहता है पैदा करता है; और वही सब कुछ जानने वाला, पूरी क़ुदरत रखने वाला है।"
यह पैदाइश के वक़्त इंसानी बच्चे की बेबसी और कमज़ोरी की तरफ़ इशारा है, जो दूसरे जानवरों के बच्चों के मुक़ाबले में कहीं ज़्यादा ना-तवां और मोहताज होता है। फिर वक़्त गुज़रने के साथ वह आहिस्ता-आहिस्ता ताक़तवर बनता है।
बचपन के बाद अल्लाह तआला जवानी और पुख़्तगी का दौर अता फ़रमाता है, जिसमें इंसान को जिस्मानी ताक़त और अक़्ली सलाहियतें हासिल होती हैं। इस दौर में इंसान जंगली जानवरों पर क़ाबू पा लेता है और हवा और पानी जैसी ताक़तों को अपने काम में लाता है — यह सब अल्लाह की अज़ीम तख़लीक़ का इज़हार है।
आख़िरकार ताक़त के ज़माने के बाद बुढ़ापा जिस्मानी और ज़ेहनी कमज़ोरी ले आता है। आजा-ए-जिस्मानी जवाब दे जाते हैं, हाफ़िज़ा कमज़ोर हो जाता है, और कभी का ताक़तवर और ज़हीन इंसान दोबारा कमज़ोर और लाचार बन जाता है। ज़िंदगी का यह तसल्सुल साबित करता है कि अल्लाह ही मुतलक़ हाकिम और बा-इल्म है, जो अपनी मर्जी के मुताबिक़ ज़िंदगी के मराहिल तय फ़रमाता है।
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