कुरान - 30:56 सूरह अर-रूम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

56
وَقَالَ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡعِلۡمَ وَٱلۡإِيمَٰنَ لَقَدۡ لَبِثۡتُمۡ فِي كِتَٰبِ ٱللَّهِ إِلَىٰ يَوۡمِ ٱلۡبَعۡثِۖ فَهَٰذَا يَوۡمُ ٱلۡبَعۡثِ وَلَٰكِنَّكُمۡ كُنتُمۡ لَا تَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Wa qaalal lazeena ootul 'ilma wal eemaana laqad labistum fee kitaabil laahi ilaa yawmil ba'si fahaazaa yawmul ba'si wa laakinnakum kuntum laa ta'lamoon)

और जिन्हें इल्म और ईमान दिया गया था [124] वे कहेंगे, 'बेशक तुम अल्लाह के लिखे हुए (फ़ैसले) के मुताबिक़ क़यामत के दिन तक ठहरे रहे हो; तो यह वही क़यामत का दिन है, लेकिन तुम जानते न थे [125]।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अर-रूम आयत 56 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अर-रूम तफ़सीर - आयत 56

"और जिन्हें इल्म और ईमान दिया गया था [124] वे कहेंगे, 'बेशक तुम अल्लाह के लिखे हुए (फ़ैसले) के मुताबिक़ क़यामत के दिन तक ठहरे रहे हो; तो यह वही क़यामत का दिन है, लेकिन तुम जानते न थे [125]।'"

[124] अहल-ए-इल्म व ईमान की बसीरत

इससे मुराद वे हज़रात हैं जिन्हें हक़ीक़ी इल्म और पुख़्ता ईमान अता हुआ। वे जानते हैं कि दुनियावी मुद्दत महदूद थी और आख़िरत के तमाम वादे, जैसा कि अल्लाह की किताब में दर्ज हैं, बिल्कुल बरहक़ और यक़ीनी हैं।

[125] काफ़िरों की ग़फ़लत और ला-इल्मी

वाज़ेह निशानियों और चेतावनियों के बावजूद काफ़िरों ने हक़ को समझने और मानने से परहेज़ किया। वे इस तरह जिए जैसे क़यामत कभी आएगी ही नहीं, और उन्होंने हिदायत के पैग़ामात को नज़रअंदाज़ कर दिया। यह आयत उनकी बे-ख़बरी और हठधर्मी को बे-नक़ाब करती है।

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