Transliteration: (Wa laqad darabnaa linnaasi fee haazal Quraani min kulli masal; wa la'in ji'tahum bi aayatil la yaqoolannal lazeena kafaroo in antum illaa mubtiloon)
"और बेशक हमने इस क़ुरआन में लोगों के लिए हर क़िस्म की मिसाल बयान फ़रमा दी है [128]; और अगर आप उनके पास कोई भी निशानी लेकर आएं [129], तो काफ़िर ज़रूर कहेंगे कि 'तुम तो बस बातिल पर हो [130]।'"
क़ुरआन-ए-पाक में तरह-तरह की मिसालें बयान फ़रमाई गई हैं ताकि लोग पैग़ाम को आसानी से समझ सकें। ये मिसालें इंसानों की हिदायत के लिए हैं, न कि नबी ﷺ के लिए, क्योंकि आप तो पहले से ही कामिल इल्म रखते थे। लोगों को समझाने का बेहतरीन इलाही तरीक़ा वाज़ेह और दिलकश मिसालें देना है।
बुज़ुर्गाने दीन फ़रमाते हैं कि गुनाह के तीन दर्जे हैं:
पहला यह कि गुनाहगार अपने गुनाह का एअतिराफ़ करे और शर्मिंदा हो, जो अल्लाह की रहमत से मुआफ़ी का बाइस बन सकता है।
दूसरा दर्जा बदतर है कि इंसान गुनाह पर बे-परवाह हो जाए और कोई नदामत महसूस न करे।
तीसरा और सबसे बुरा दर्जा यह है कि इंसान अपने गुनाहों की तावीलें गढ़े, नेकियों का मज़ाक़ उड़ाए, और तकब्बुर से हिदायत को ठुकरा दे। ऐसे सख़्त दिल का इलाज नामुमकिन के क़रीब है, और यह आयत ऐसे ही मुतकब्बिरों के बारे में है।
चाहे उनके सामने कैसा ही बड़ा मोजिज़ह या निशानी क्यों न आ जाए, काफ़िर अपनी हठधर्मी की वजह से उसे बातिल कह देते हैं। यह इंकार दलील की कमी की वजह से नहीं बल्कि उनके दिलों की सख़्ती और तकब्बुर की वजह से होता है।
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