Transliteration: (Fa Yawma'izil laa yanfa'ul lazeena zalamoo ma'ziratu hum wa laa hum yusta'taboon)
"पस उस दिन ज़ालिमों को उनका कोई उज़्र (बहाना) नफ़ा न देगा [126], और न उनसे (अल्लाह को) राज़ी करने का मुतालबा किया जाएगा [127]।"
क़यामत के दिन ज़ालिमों के झूठे बहाने कोई फ़ायदा नहीं देंगे। सच्ची तौबा में शर्मिंदगी और दोबारा गुनाह न करने का पुख़्ता इरादा होता है, जबकि महज़ मजबूरियों का रोना रोना कोई उज़्र नहीं बनता। सच्ची तौबा मुआफ़ मांगना और गुनाह छोड़ने का अह्द है।
उस दिन किसी ज़ालिम या मुशरिक के हक़ में कोई सिफ़ारिश या रज़ामंदी की दरख़्वास्त क़बूल नहीं होगी। मोमिनों पर रहम व करम फ़रमाया जाएगा और उनके मुहासिबे में नरमी बरती जाएगी, यहाँ तक कि गुनाहों के इज़हार के बाद भी मुआफ़ फ़रमा दिया जाएगा। लेकिन ज़ालिमों के लिए बहानों का दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद होगा और कोई मददगार न होगा।
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