Transliteration: (Wa maa anta bihaadil 'umyi 'an dalaalatihim in tusmi'u illaa mai yuminu bi aayaatinaa fahum muslimoon (section 5))
"और न आप अंधों को उनकी गुमराही से (निकाल कर) राह दिखाने वाले हैं [118]; आप तो बस उन्हीं को सुना सकते हैं जो हमारी आयात पर ईमान लाते हैं, फिर वे फ़रमांबरदार (मुस्लिम) हो जाते हैं [119]।"
यहाँ अंधों से मुराद बातिनी तौर पर अंधे लोग हैं—जो सच्चे ईमान और बसीरत से महरूम हैं। ऐसे बदनसीब लोगों को नबी ﷺ हिदायत नहीं दे सकते क्योंकि हिदायत अल्लाह की अता कर्दा नेअमत है। इसका मतलब यह है कि जो लोग यह कहते हैं कि नबी हिदायत नहीं दे सकते, वे दरअसल अपनी बातिनी अंधाधुंध गुमराही का एअतिराफ़ कर रहे होते हैं।
पिछली आयत में मुर्दा का लफ़्ज़ काफ़िरों के लिए इस्तेमाल हुआ था, न कि क़ब्रों में मदफ़ून इंसानों के लिए, क्योंकि यहाँ ईमान वालों का मुक़ाबला काफ़िरों से किया गया है, मुर्दों से नहीं। क़ुरआन में दूसरी जगह साबित है कि मुर्दे सुनते हैं, जैसा कि गुज़रे हुए अंबिया ने वफ़ात शुदा लोगों से ख़िताब फ़रमाया।
अगर इस आयत को ज़ाहिरी तौर पर जिस्मानी अंधों पर महमूल किया जाए तो यह ग़लत होगा, क्योंकि बहुत से नाबीना हज़रात ईमान लाए और हिदायत याफ़्ता हुए।
पस, 'मुर्दा' और 'अंधा' यहाँ रूहानी तौर पर बे-जान और बातिन से अंधे काफ़िरों के लिए इस्तिआरा हैं। आयत का मफ़हूम यह है कि सिर्फ़ वही लोग सुनते और फ़ायदा उठाते हैं जो ईमान लाते हैं और अल्लाह के हुक्मों के आगे झुक जाते हैं।
यह तफ़सीर क़ुरआन की दूसरी आयात और अहादीस-ए-मुबारका के ऐन मुताबिक़ है जिनसे साबित है कि क़ब्रों में मुर्दे सलाम और कलाम सुनते हैं।
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