कुरान - 30:51 सूरह अर-रूम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

51
وَلَئِنۡ أَرۡسَلۡنَا رِيحٗا فَرَأَوۡهُ مُصۡفَرّٗا لَّظَلُّواْ مِنۢ بَعۡدِهِۦ يَكۡفُرُونَ

Transliteration: (Wa la'in arsalnaa reehan fara awhu musfarral lazalloo mim ba'dihee yakfuroon)

और अगर हम कोई ऐसी (सर्द या गर्म) हवा भेज दें [115] जिससे वे अपनी खेती को ज़र्द (मुरझाई हुई) देखें, तो वे इसके बाद ज़रूर ना-शुक्री करने लगेंगे [116]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अर-रूम आयत 51 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अर-रूम तफ़सीर - आयत 51

"और अगर हम कोई ऐसी (सर्द या गर्म) हवा भेज दें [115] जिससे वे अपनी खेती को ज़र्द (मुरझाई हुई) देखें, तो वे इसके बाद ज़रूर ना-शुक्री करने लगेंगे [116]।"

[115] रहमत और अज़ाब की हवाएं

क़ुरआनी इस्तेलाह में रहमत की हवा को रियाह (جمع) कहा जाता है, जबकि अज़ाब या आज़माइश की हवा को रीह (واحد) कहा जाता है। शुरू में बारिश और बरकत के ज़िक्र में रियाह का लफ़्ज़ आया था, जबकि यहाँ आज़माइश के मक़ाम पर रीह का लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ।

[116] काफ़िरों की ना-शुक्री

खेती के मुरझाने या नुक़सान की सूरत में काफ़िर फ़ौरन ना-शुक्री पर उतर आते हैं। वे न तो आसानी में शुक्रगुज़ार होते हैं और न तकलीफ़ में सब्र करते हैं। इसके बरअक्स, नेअमत मिलने पर ग़ुरूर करते हैं और मुसीबत आने पर बे-सब्री और शिकायत का इज़हार करते हैं।

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