Transliteration: (Awalam yatafakkaroo feee anfusihim; maa khalaqal laahus samaawaati wal arda wa maa bainahumaaa illaa bil haqqi wa ajalim musammaa; wa inna kaseeram minan naasi biliqaaa'i Rabbihim lakaafiroon)
"क्या उन्होंने अपने दिलों में ग़ौर नहीं किया [10] कि अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके दरमियान है, हक़ (हिकमत) के साथ [11] और एक मुक़र्रर मुद्दत ही के लिए पैदा फ़रमाया है [12]? और बेशक बहुत से लोग [13] अपने रब की मुलाक़ात का इंकार करने वाले हैं [14]।"
इंसान अगर अपनी ही पैदाइश, अपनी रूह और जिस्म की साख़्त में ग़ौर करे तो उसे ख़ालिक़-ए-हक़ीक़ी की मारिफ़त हासिल हो जाए। अक़्ल और बसीरत का सही इस्तेमाल इंसान को ईमान की तरफ़ ले जाता है।
अल्लाह तआला ने आसमानों, ज़मीन और पूरी क़ायनात को किसी बेकार खेल के तौर पर नहीं, बल्कि हक़, इंसाफ़ और अज़ीम हिकमत के तहत वजूद बख़्शा है।
क़ायनात की हर चीज़ के लिए एक मियाद मुक़र्रर है जिसके बाद उसे फ़ना होना है। यह दुनिया दारुल-इम्तिहान है और आख़िरत दारुल-जज़ा है।
इतने वाज़ेह दलाइल के बावजूद बहुत से लोग हठधर्मी और ग़फ़लत में मुब्तला हैं।
वे अपने रब की बारगाह में दोबारा ज़िंदा होकर हाज़िर होने और हिसाब-ओ-किताब का इंकार करते हैं, यही इंकार उनके तमाम गुनाहों की जड़ है।
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