Transliteration: (Awalam yaseeroo fil ardi fa-yanzuroo kaifa kaana 'aaqibatul lazeena min qablihim; kaanooo ashadda minhhum quwwatanw wa asaarul arda wa 'amaroohaaa aksara mimmaa 'amaroohaa wa jaaa'athum Rusuluhum bil baiyinaati famaa kaanal laahu liyazli mahum wa laakin kaanooo anfusahum yazlimoon)
"क्या उन्होंने ज़मीन में सैर नहीं की कि देखते कि उन लोगों का कैसा अंजाम हुआ [15] जो उनसे पहले थे? वे ताक़त में इनसे कहीं ज़्यादा सख़्त थे [16], और उन्होंने ज़मीन को जोता (खोदा) था और उसे इनसे ज़्यादा आबाद किया था [17], और उनके पास उनके रसूल खुली निशानियाँ लेकर आए थे [18]; तो अल्लाह ऐसा न था कि उन पर ज़ुल्म करता [19], बल्कि वे ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म करते रहे थे।"
सफ़र करने का एक मक़सद यह भी होना चाहिए कि इंसान पिछली हलाक शुदा सरकश क़ौमों के खण्डहरों को देखकर इब्रत हासिल करे कि नाफ़रमानी का अंजाम कितना भयानक होता है।
क़ौमे आद और समूद जिस्मानी क़द-ओ-क़ामत, ताक़त और लंबी उम्रों में अहले मक्का से कहीं आगे थीं। पहाड़ों को तराश कर महल बनाते थे।
उन्होंने ज़मीन में नहरें खोदीं, काश्तकारी की, बाग़ात लगाए और आलीशान शहर बसाए, मगर जब अल्लाह का अज़ाब आया तो उनकी कोई हुनरमंदी और दौलत काम न आई।
अल्लाह ने हर ज़माने के तक़ाज़े के मुताबिक़ अम्बिया को रौशन मौजिज़ात देकर भेजा ताकि हुज्जत तमाम हो जाए। जब उन्होंने मौजिज़ात देखकर भी झुठलाया तो हलाक कर दिए गए।
अल्लाह ने उन पर कोई बेजा ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि उन्होंने नेमतों का ग़लत इस्तेमाल करके और रसूलों की तकज़ीब करके ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म ढाया था।
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