Transliteration: (Wa salaamun 'alalmursaleen)
"और सलाम [177] हो रसूलों पर!"
यह आयत मुबारका तमाम अंबिया व रसूलों की मुक़द्दस बारगाह में इलाही सलामती और रहमतों का अज़ीम नज़राना है, जो उनकी अज़मत और बुलंदी को उजागर करता है।
इस आयत से दो अहम शरई अहकाम हासिल होते हैं:
अंबिया-ए-किराम के अस्मा-ए-मुबारका के बाद "अलैहिस्सलाम" कहना शरअन साबित और मुस्तहब है (जैसे मूसा अलैहिस्सलाम)। यह लफ़्ज़ मुस्तक़िल तौर पर ग़ैर-अंबिया के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि यह अंबिया की ख़ास सुन्नत और शआर है।
हुज़ूर सय्यिदे आलम ﷺ की बारगाह में "या नबी सलाम अलैका" या "अस्सलामु अलैका अय्युहन नबी" के अल्फ़ाज़ के साथ ब-तरीक़े ख़िताब सलातो-सलाम पेश करना इस आयत से साबित और निहायत बा-बरकत है।
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