Transliteration: (Fa izaa nazala bisaahatihim fasaaa'a sabaahul munzareen)
"फिर जब वह उनके आंगन में उतरेगा, तो क्या ही बुरी सुबह होगी [174] उन डराए हुओं की!"
यह आयत तंबीह करती है कि जब अल्लाह का अज़ाब अचानक उनके सहन (आंगन) और घरों में आ गिरेगा, तो उन लोगों के लिए जिनकी उम्र नाफ़रमानी में गुज़री, वह सुबह निहायत हौलनाक और मनहूस सुबह साबित होगी।
मक्का के मुशरिकीन पर क़हत, जंगों में ज़िल्लत-आमेज़ शिकस्त और क़त्ल का जो अज़ाब उतरा, उससे वे बच न सके।
हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़तहे ख़ैबर के मौक़े पर यह आयत तिलावत फ़रमाई थी जब यहूदियों के क़िलों पर मुजाहिदीन का अचानक ग़लबा हुआ।
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