Transliteration: (Tanzeelul Kitaabi laa raiba feehi mir rabbil 'aalameen)
"इस किताब का नाज़िल होना [2] बेशक [3] तमाम जहानों के रब की तरफ़ से है।"
सूरह अस-सजदा मक्की है, सिवाय आयत 18 ता 20 के।
इस सूरह में तीन रुकूअ, तीस आयतें, तीन सौ अस्सी कलिमात (अल्फ़ाज़), और एक हज़ार पाँच सौ अठारह हुरूफ़ हैं।
इससे हमें मालूम होता है कि हज़रत जिब्रील (अलैहिस्सलाम), हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ, और तमाम सहाबा-ए-किराम अमानत और सच्चाई का मुजस्समा हैं, क्योंकि क़ुरआन-ए-मजीद हम तक इन्हीं तीन मराहिल (दरजों) से होकर पहुँचा है।
अगर (मआज़अल्लाह) इनमें से किसी एक में भी अमानतदारी की कमी का तसव्वुर किया जाए, तो क़ुरआन-ए-करीम की सनद ही मशकूक हो जाएगी।
क़ुरआन-ए-पाक की मुख़्तलिफ़ आयतें मुख़्तलिफ़ सहाबा ने रिवायत फ़रमाई हैं, लिहाज़ा तमाम सहाबा-ए-किराम आदिल और मोतबर हैं।
यहाँ एक लतीफ़ इशारा है कि क़ुरआन-ए-पाक तमाम जहानों के लिए नाज़िल फ़रमाया गया है, क्योंकि यह रब्बुल आलमीन की तरफ़ से है।
जैसा कि क़ुरआन में दूसरी जगह इरशाद फ़रमाया: "हुदल-लिल-आलमीन" (तमाम जहानों के लिए हिदायत)।
इसी तरह हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ भी तमाम जहानों के लिए रसूल बनाकर भेजे गए हैं, जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
"ताकि वह तमाम जहान वालों के लिए डराने वाले (वारनर) हों" (सूरह अल-फ़ुरक़ान, आयत 1)।
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