Transliteration: (Allaahul lazee khalaqas samaawaati wal arda wa maa bainahumaa fee sittati ayyaamin thummas tawaa 'alal 'arsh; maa lakum min doonihee minw-waliyyinw-wala shafee'; afalaa tatazakkaroon)
"अल्लाह ही है जिसने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके दरमियान है छह दिनों में पैदा किया [8], फिर अर्श पर इस्तिवा फ़रमाया [9]; उसके सिवा न तुम्हारा कोई मददगार है और न कोई सिफ़ारशी [10]; तो क्या तुम नसीहत हासिल नहीं करते?"
कायनात को छह दिनों में पैदा फ़रमाना बंदों को सब्र और निज़ाम का सबक़ देना है, ताकि इंसान अपने कामों में जल्दबाज़ी न करे।
यहाँ “छह दिनों” से मुराद वक़्त की मख़्सूस मुद्दतें हैं, क्योंकि उस वक़्त न सूरज था, न चाँद और न ही दिन-रात का गर्दिशी निज़ाम था।
अल्लाह का अर्श पर इस्तिवा फ़रमाना इस बात का इज़हार है कि अल्लाह तआला ने अर्श की तरफ़ ख़ास तवज्जोह फ़रमाई और अपनी बादशाही का मुज़ाहरा फ़रमाया।
इसे ज़ाहिरी मानों में “बैठने” पर महमूल करना शान-ए-इलाही के बिल्कुल ख़िलाफ़ है, क्योंकि अल्लाह तआला जिस्म और मक़ान की तमाम पाबंदियों से पाक है।
यह हिस्सा काफ़िरों से ख़िताब करता है कि ईमान के बग़ैर क़यामत के दिन उनका न कोई मददगार होगा और न कोई सिफ़ारशी।
जहाँ तक मोमिनीन का तअल्लुक़ है, अल्लाह तआला उनके लिए बहुत से शफ़ाअत करने वाले मुक़र्रर फ़रमाएगा, लेकिन उनकी यह शफ़ाअत सिर्फ़ अल्लाह की इजाज़त से होगी।
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