कुरान - 32:3 सूरह अस-सज्दा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

3
أَمۡ يَقُولُونَ ٱفۡتَرَىٰهُۚ بَلۡ هُوَ ٱلۡحَقُّ مِن رَّبِّكَ لِتُنذِرَ قَوۡمٗا مَّآ أَتَىٰهُم مِّن نَّذِيرٖ مِّن قَبۡلِكَ لَعَلَّهُمۡ يَهۡتَدُونَ

Transliteration: (Am yaqooloonaf taraahu bal huwal haqqu mir rabbika litunzira qawma maaa ataahum min nazeerim min qablika la'allahum yahtadoon)

क्या वे कहते हैं कि 'इन्होंने इसे ख़ुद घड़ लिया है [4]?' बल्कि यह आपके रब की तरफ़ से हक़ है [5], ताकि आप उस क़ौम को डराएं जिसके पास आपसे पहले कोई डराने वाला नहीं आया [6], ताकि वे हिदायत पा जाएं [7]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अस-सज्दा आयत 3 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अस-सजदा तफ़सीर - आयत 3

"क्या वे कहते हैं कि 'इन्होंने इसे ख़ुद घड़ लिया है [4]?' बल्कि यह आपके रब की तरफ़ से हक़ है [5], ताकि आप उस क़ौम को डराएं जिसके पास आपसे पहले कोई डराने वाला नहीं आया [6], ताकि वे हिदायत पा जाएं [7]।"

[4] काफ़िरों के मुतज़ाद और बे-बुनियाद इल्ज़ामात

काफ़िरों के इल्ज़ामात में कोई साबित-क़दमी न थी।
वे कभी क़ुरआन-ए-करीम को जादू कहते, कभी शायरी, कभी पुरानी कहानियाँ, और कभी (मआज़अल्लाह) हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ का ख़ुद घड़ा हुआ कलाम क़रार देते।

[5] क़ुरआन ख़ालिस अल्लाह का कलाम है

यह आयत वाज़ेह फ़रमाती है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ अल्लाह तआला ही की तरफ़ से हैं—जो बरहक़ और सच्चा कलाम-ए-इलाही है।
यह बात ज़हन-नशीन रहे कि अगरचे हदीस शरीफ़ का मफ़हूम भी अल्लाह तआला की तरफ़ से होता है, लेकिन उसके अलफ़ाज़ हुज़ूर ﷺ के मुबारका अलफ़ाज़ होते हैं; जबकि क़ुरआन-ए-पाक में अलफ़ाज़ और मआनी दोनों ख़ालिस अल्लाह की तरफ़ से हैं।

[6] अहले फ़तरत और हिदायत का पैग़ाम

हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) के ज़माने से लेकर हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की बाअसत तक हिजाज़ या सरज़मीन-ए-अरब में कोई नबी नहीं भेजा गया था।
बनी इस्राईल के अंबिया अरबों की तरफ़ नहीं बल्कि अपनी क़ौम के लिए ख़ास थे।
जैसा कि हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) ने फ़रमाया: "और वह बनी इस्राईल की तरफ़ रसूल होंगे" (सूरह आले इमरान, आयत 49)।

या इसका दूसरा मफ़हूम यह है कि हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) के बाद एक लंबे अर्से तक कोई नबी तशरीफ़ नहीं लाए, जिसकी वजह से दुनिया में कुफ़्र और जहालत आम हो गई थी।
इस दरमियानी मुद्दत को फ़तरत का ज़माना कहा जाता है, और उस दौर के लोगों को अहले फ़तरत कहते हैं।

अगरचे हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ तमाम इंसानियत के लिए भेजे गए हैं, लेकिन आपकी तबलीग़ का पहला दौर आपके अपने ख़ानदान व क़बीले, फिर अहले अरब, और उसके बाद पूरी दुनिया के लिए था। पस यह आयत आपकी आफ़ाक़ी नबुव्वत के हरगिज़ मुनाफ़ी नहीं है।

[7] इलाही इल्म और नबवी बसीरत

"ताकि वे हिदायत पा जाएं" का जुमला ज़ाहिरी अस्बाब के लिहाज़ से उम्मीद को ज़ाहिर करता है, इसलिए नहीं कि (मआज़अल्लाह) अल्लाह को इल्म नहीं था।
अल्लाह तआला ख़ूब जानता है कि कौन ईमान लाएगा और कौन कुफ़्र पर मरेगा।
इसी तरह वही-ए-इलाही के ज़रिए हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ को भी सच्चे मोमिनों और मुनाफ़िक़ों की पूरी बसीरत और इल्म हासिल था।

आपने यहाँ तक कि मोमिनीन के दरजात मुक़र्रर फ़रमा दिए:
आपने फ़रमाया: "फ़ातिमा जन्नती औरतों की सरदार हैं," और "हसन और हुसैन जन्नत के जवानों के सरदार हैं।"
और अल्लाह तआला फ़रमाता है: "और यह रसूल तुम पर निगहबान और गवाह हैं" (सूरह अल-बक़रह, आयत 143)।

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