कुरान - 26:3 सूरह अश-शुअरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

3
لَعَلَّكَ بَٰخِعٞ نَّفۡسَكَ أَلَّا يَكُونُواْ مُؤۡمِنِينَ

Transliteration: (La'allaka baakhi'un nafsaka allaa yakoonoo mu'mineen)

(ऐ नबी!) शायद आप इस ग़म में अपनी जान ही घुला देंगे कि ये लोग ईमान क्यों नहीं लाते [3]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शुअरा आयत 3 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अश-शुआरा – आयत 3

"(ऐ नबी!) शायद आप इस ग़म में अपनी जान घुला देंगे कि ये लोग ईमान नहीं लाते [3]!"

[3] हुज़ूर रहमतुल-लिल-आलमीन ﷺ की बेपनाह शफ़क़त व ग़मख़्वारी

हुज़ूर अक़दस ﷺ अपनी उम्मत के लिए बेपनाह रहम व करम रखने वाले हैं। जब कुफ़्फ़ार-ए-मक्का कुफ़्र पर अड़े रहते और अपनी हलाकत का सामान करते, तो हुज़ूर ﷺ को उनके अंजाम का इतना शदीद ग़म और सदमा होता कि गोया आप अपनी जान-ए-मुक़द्दस को घुला देंगे। अल्लाह तआला ने अपने हबीब को तसल्ली देते हुए फ़रमाया कि ऐ महबूब! आप इन बदबख़्तों के ग़म में अपने आप को मशक़्क़त में न डालें, आपका काम सिर्फ़ हक़ पहुंचाना है।

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