कुरान - 26:4 सूरह अश-शुअरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

4
إِن نَّشَأۡ نُنَزِّلۡ عَلَيۡهِم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ ءَايَةٗ فَظَلَّتۡ أَعۡنَٰقُهُمۡ لَهَا خَٰضِعِينَ

Transliteration: (In nashaa nunazzil 'alaihim minas samaaa'i Aayatan fazallat a'naaquhum lahaa khaadi'een)

अगर हम चाहें तो आसमान से उन पर ऐसी निशानी (अज़ाब) उतार दें कि उनकी गर्दनें उसके आगे झुक कर रह जाएं [4]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शुअरा आयत 4 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अश-शुआरा – आयत 4

"अगर हम चाहें तो आसमान से ऐसी निशानी उतार दें कि उनकी गर्दनें झुक कर रह जाएं [4]।"

[4] क़ुदरत-ए-इलाही और इख़्तियारी ईमान की हिकमत

अल्लाह तआला इस पर पूरी तरह क़ादिर है कि आसमान से ऐसा ख़ौफ़नाक मोजिज़ा या अज़ाब की निशानी नाज़िल फ़रमा दे कि तमाम मुनकिरीन और सरकशों की गर्दनें आजिज़ी के साथ झुक जाएं और वे बेबस होकर कलिमा पढ़ लें। लेकिन अल्लाह की हिकमत का तकाज़ा यह है कि बन्दे अपनी समझ, अक़्ल और आज़ाद इरादे से ईमान लाएं, न कि मजबूरी और ज़बरदस्ती से।

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