कुरान - 42:21 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

21
أَمۡ لَهُمۡ شُرَكَـٰٓؤُاْ شَرَعُواْ لَهُم مِّنَ ٱلدِّينِ مَا لَمۡ يَأۡذَنۢ بِهِ ٱللَّهُۚ وَلَوۡلَا كَلِمَةُ ٱلۡفَصۡلِ لَقُضِيَ بَيۡنَهُمۡۗ وَإِنَّ ٱلظَّـٰلِمِينَ لَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٞ

Transliteration: (Am lahum shurakaaa'u shara'oo lahum minad deeni maa lam ya'zan bihil laah; wa law laa kalimatul fasli laqudiya bainahum; wa innaz zaalimeena lahum 'azaabun aleem)

क्या उनके ऐसे शरीक हैं जिन्होंने उनके लिए दीन का ऐसा तरीक़ा मुक़र्रर कर दिया है जिसकी अल्लाह ने इजाज़त नहीं दी [65]? और अगर फ़ैसले का फ़रमान पहले से तय न होता [66], तो उनके दरमियान फ़ैसला कर दिया गया होता; और बेशक ज़ालिमों के लिए दर्दनाक अज़ाब है [67]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 21 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 21

क्या उनके ऐसे शरीक हैं जिन्होंने उनके लिए दीन का ऐसा तरीक़ा मुक़र्रर कर दिया है जिसकी अल्लाह ने इजाज़त नहीं दी [65]? और अगर फ़ैसले का फ़रमान पहले से तय न होता [66], तो उनके दरमियान फ़ैसला कर दिया गया होता; और बेशक ज़ालिमों के लिए दर्दनाक अज़ाब है [67]!

[65] शैतानी तरीक़े और मनघड़ंत दीन

मुशरिक़ीन ने अपने सरदारों और शैतानों के कहने पर शिर्क, हराम चीज़ों को हलाल और हलाल को हराम ठहराने के बातिल तरीक़े गढ़ लिए थे जिनकी अल्लाह ने कोई सनद नाज़िल नहीं फ़रमाई।

[66] फ़ैसले के दिन की मोहल्लत

अल्लाह तआला का यह अद्ल है कि मुकम्मल जज़ा व सज़ा के लिए क़यामत का दिन मुक़र्रर है, वरना उनकी इस सरकशी पर दुनिया ही में उन पर अज़ाब आ जाता।

[67] काफ़िरों के लिए दर्दनाक अज़ाब

ज़ालिमों यानी काफ़िरों के लिए जहन्नम की दायमी सज़ा मुक़र्रर है जिससे वे कभी न निकल सकेंगे।

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