कुरान - 42:30 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

30
وَمَآ أَصَٰبَكُم مِّن مُّصِيبَةٖ فَبِمَا كَسَبَتۡ أَيۡدِيكُمۡ وَيَعۡفُواْ عَن كَثِيرٖ

Transliteration: (Wa maaa asaabakum min museebatin fabimaa kasabat aydeekum wa ya'foo 'an kaseer)

और तुम्हें जो कोई मुसीबत पहुंचती है [91], वह तुम्हारे ही हाथों की कमाई (गुनाहों) की वजह से है [92]; और वह बहुत से (गुनाहों) को तो मुआफ़ फ़रमा देता है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 30 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 30

और तुम्हें जो कोई मुसीबत पहुंचती है [91], वह तुम्हारे ही हाथों की कमाई (गुनाहों) की वजह से है [92]; और वह बहुत से (गुनाहों) को तो मुआफ़ फ़रमा देता है।

[91] मुसीबतों के असबाब और आर्या समाज का रद्दे अमल

यह आयत आम मुकल्लफ़ इंसानों के बारे में है। आर्या समाजियों ने एतराज़ किया था कि अगर मुसीबत गुनाहों की वजह से आती है तो मासूम बच्चे और जानवर क्यों बीमार होते हैं! यह उनका बेजा शुबहा है, क्योंकि मासूम बच्चे और अंबिया-ए-किराम इस आयत के ख़िताब में दाखिल नहीं हैं। अंबिया पर तकलीफ़ उनके दर्जात की बुलंदी के लिए होती है, मासूमों पर आज़माइश वालिदैन के इम्तिहान और अज्र के लिए होती है।

[92] अपने ही आमाल का वबाल

आम इंसानों पर जो परेशानियां आती हैं वे अक्सर उनके अपने गुनाहों, ग़फ़लतों और नाफ़रमानियों का नतीजा होती हैं। अगर अल्लाह तआला हर गुनाह पर पकड़ फ़रमाता तो कोई बच न पाता, मगर वह बहुत से गुनाहों को अपने करम से मुआफ़ फ़रमा देता है।

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