कुरान - 42:48 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

48
فَإِنۡ أَعۡرَضُواْ فَمَآ أَرۡسَلۡنَٰكَ عَلَيۡهِمۡ حَفِيظًاۖ إِنۡ عَلَيۡكَ إِلَّا ٱلۡبَلَٰغُۗ وَإِنَّآ إِذَآ أَذَقۡنَا ٱلۡإِنسَٰنَ مِنَّا رَحۡمَةٗ فَرِحَ بِهَاۖ وَإِن تُصِبۡهُمۡ سَيِّئَةُۢ بِمَا قَدَّمَتۡ أَيۡدِيهِمۡ فَإِنَّ ٱلۡإِنسَٰنَ كَفُورٞ

Transliteration: (Fa-in a'radoo famaaa arsalnaaka 'alaihim hafeezan in 'alaika illal balaagh; wa innaaa izaaa azaqnal insaana minnaa rahmatan fariha bihaa wa in tusibhum saiyi'atun bimaa qaddamat aydeehim fa innal insaana kafoor)

फिर अगर वे मुंह मोड़ें [135], तो हमने आपको उन पर कोई निगहबान बनाकर नहीं भेजा [136]; आप पर तो सिर्फ़ (पैग़ाम) पहुंचा देना ही लाज़िम है [137]; और बेशक जब हम इंसान को अपनी तरफ़ से रहमत का मज़ा चखाते हैं [138], तो वह उस पर इतराने लगता है [139]; और अगर उन्हें उनके ही हाथों की भेजी हुई करतूतों की वजह से कोई तकलीफ़ पहुंचे [140], तो इंसान बड़ा ही ना-शुकरा बन जाता है [141]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 48 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 48

फिर अगर वे मुंह मोड़ें [135], तो हमने आपको उन पर कोई निगहबान बनाकर नहीं भेजा [136]; आप पर तो सिर्फ़ (पैग़ाम) पहुंचा देना ही लाज़िम है [137]; और बेशक जब हम इंसान को अपनी तरफ़ से रहमत का मज़ा चखाते हैं [138], तो वह उस पर इतराने लगता है [139]; और अगर उन्हें उनके ही हाथों की भेजी हुई करतूतों की वजह से कोई तकलीफ़ पहुंचे [140], तो इंसान बड़ा ही ना-शुकरा बन जाता है [141]!

[135] काफ़िरों का एराज़

काफ़िर हक़ बात सुनने के बाद भी अपनी हठधर्मी पर क़ाइम रहते हैं।

[136] [137] हुज़ूर ﷺ की मुकम्मल तब्लीग़ और बरी-उज़्ज़िम्मा होना

हुज़ूर ﷺ पर उनके ज़बरदस्ती मुसलमान बनाने की ज़िम्मेदारी नहीं थी; आपका काम पैग़ाम पहुंचा देना था जो आपने ब-कमाल-ओ-तमाम अंजाम दिया।

[138] [139] नेअमत पर इतराना और तकब्बुर

ग़ाफ़िल इंसान नेअमत पाकर रब का शुक्र अदा करने के बजाए अपनी दौलत व इज़्ज़त पर घमंड करने लगता है।

[140] [141] मुसीबत पर नाशुक्र गुज़ारी

और जब अपने ही गुनाहों की पादाश में कोई तकलीफ़ आती है, तो पिछली तमाम नेअमतों को भूल कर रब का नाशुक्रा बन जाता है।

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