कुरान - 42:51 सूरह अश-शूरा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

51
۞وَمَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُكَلِّمَهُ ٱللَّهُ إِلَّا وَحۡيًا أَوۡ مِن وَرَآيِٕ حِجَابٍ أَوۡ يُرۡسِلَ رَسُولٗا فَيُوحِيَ بِإِذۡنِهِۦ مَا يَشَآءُۚ إِنَّهُۥ عَلِيٌّ حَكِيمٞ

Transliteration: (Wa maa kaana libasharin any yukallimahul laahu illaa wahyan aw minw waraaa'i hijaabin aw yursila Rasoolan fa yoohiya bi iznihee maa yashaaa'; innahoo 'Aliyyun Hakeem)

और किसी बशर (इंसान) की यह शान नहीं [146] कि अल्लाह उससे (रू-ब-रू) कलाम फ़रमाए [147], सिवाए वही के ज़रिए [148], या पर्दे के पीछे से [149], या वह किसी फ़रिश्ते (पैग़ामबर) को भेज दे तो वह उसके हुक्म से जो चाहे वही करे [150]; बेशक वह बहुत बुलंद, बड़ी हिकमत वाला है [151]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अश-शूरा आयत 51 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अश्-शूरा तफ़सीर - आयत 51

और किसी बशर (इंसान) की यह शान नहीं [146] कि अल्लाह उससे (रू-ब-रू) कलाम फ़रमाए [147], सिवाए वही के ज़रिए [148], या पर्दे के पीछे से [149], या वह किसी फ़रिश्ते (पैग़ामबर) को भेज दे तो वह उसके हुक्म से जो चाहे वही करे [150]; बेशक वह बहुत बुलंद, बड़ी हिकमत वाला है [151]!

[146] [147] दुनिया में कलाम-ए-इलाही की सूरतें

दुनिया में इंसान के जिस्मानी क़ुवा इस क़ाबिल नहीं कि वे बराहे-रास्त बे-हिजाब कलाम-ए-इलाही और दीदार की ताब ला सकें। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से कलाम पर्दे के पीछे (तूरे सीना पर हिजाब के साथ) हुआ।

अलबत्ता हमारे आक़ा व मौला सैयदे आलम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को शब-ए-मेअराज अर्श-ए-आज़म पर बुला कर दुनियावी हुदूद से बाहर बे-हिजाब दीदार और हमकलाम होने का ख़ास एज़ाज़ बख़्शा गया।

[148] वही-ए-क़ल्बी और रुया-ए-सादिरा

सच्चे ख़्वाब के ज़रिए (जैसे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को बेटे की क़ुर्बानी का हुक्म) या दिल में इलक़ा के ज़रिए (जैसे हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम पर ज़बूर का नुज़ूल)।

[149] पर्दे के पीछे से कलाम

जैसे हज़रत मूसा कलीमुल्लाह अलैहिस्सलाम से दरख़्त और नूर के हिजाब से कलाम हुआ।

[150] फ़रिश्ते (जिब्रील-ए-अमीन) के ज़रिए वही

हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम बारगाह-ए-इलाही से पैग़ाम लाकर अंबिया-ए-किराम तक पहुंचाते थे।

[151] शान-ए-नुज़ूल: यहूदियों के एतराज़ का जवाब

यहूदियों ने कहा था कि अगर आप सच्चे नबी हैं तो जैसे मूसा ने अल्लाह को देखा और कलाम किया वैसे आप क्यों नहीं करते! हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि मूसा अलैहिस्सलाम ने भी ज़ात-ए-बारी को नहीं देखा था बल्कि हिजाब से कलाम सुना था। इस आयत ने हुज़ूर ﷺ के फ़रमान की तस्दीक़ फ़रमाई।

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