Transliteration: (Wa mimmann hawlakum minal A'raabi munaafiqoona wa min ahlil Madeenati maradoo 'alan nifaaq, laa ta'lamuhum nahnu na'lamuhum; sanu'azzibuhum marrataini summa yuraddoona ilaa 'azaabin 'azeem)
इस आयत में मदीना से ख़ास तौर पर मदीना मुनव्वरा (नबी ﷺ का बरकत वाला शहर) मुराद है। जबकि अरबी में "मदीना" आम तौर पर किसी भी शहर को कहते हैं, मगर यहाँ इससे ख़ास तौर पर नबी ﷺ का शहर मुराद है, जो तैयबा, ताबा और बत्हा जैसे नामों से भी जाना जाता है। इस शहर को "यसरिब" कहना मना है, क्योंकि नबी ﷺ ने इसका नाम बदलकर मदीना रखा था।
आयत बताती है कि मदीना मुनव्वरा के इर्द-गिर्द के गाँवों में कई मुनाफ़िक़ रहते थे। इनमें जुहैना, मुज़ैना, असलम, अश्जा और ग़िफ़ार जैसे क़बीले शामिल थे। इन गाँवों में ऐसे लोग बसे हुए थे जिन्होंने निफ़ाक़ अपना लिया था और मदीना के मोमिनों के सच्चे ईमान से दूर हो गए थे।
आयत बयान करती है कि नबी ﷺ मुनाफ़िक़ों को नहीं जानते हों, मगर अल्लाह उन्हें पूरी तरह जानता है। यह नबी ﷺ के इल्म की नफ़ी नहीं है, बल्कि अल्लाह के ग़ज़ब का इज़हार है। यह उस तरह है जैसे कोई हाकिम अपने भरोसेमंद साथी से किसी मुजरिम के बारे में कहे: "तुम इस बुरे इंसान को वैसे नहीं जानते जैसे मैं जानता हूँ।" इसके अलावा यह आयत उस वक़्त से पहले उतरी होगी जब नबी ﷺ को मुनाफ़िक़ों के बारे में बताया गया, क्योंकि बाद की आयतें कहती हैं: "और तुम उन्हें उनकी बोली से पहचान लोगे" (सूरा 47:30)।
आयत बताती है कि अल्लाह मुनाफ़िक़ों को दो बार अज़ाब देगा — दुनिया में और क़ब्र में — इससे पहले कि वे आख़िरत के बड़े अज़ाब की तरफ़ लौटाए जाएँ। दुनिया और क़ब्र का अज़ाब आख़िरी अज़ाब से हल्का है, जो इस बात पर ज़ोर देता है कि निफ़ाक़ की आख़िरी सज़ा आख़िरत में है। दुनिया के अज़ाब की मिसाल यह थी कि नबी ﷺ ने जुमे के दिन नाम लेकर कुछ मुनाफ़िक़ों को मस्जिद से निकलवाया, जिससे उनकी रुसवाई सबके सामने हुई। यह भी उनके निफ़ाक़ की सज़ा थी।
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