Transliteration: (Khuz min amwaalihim sadaqatan tutahhiruhum wa tuzakkeehim bihaa wa salli 'alaihim inna salaataka sakanul lahum; wallaahu Samee'un 'Aleem)
यह आयत नबी ﷺ को हुक्म देती है कि वे उनके माल में से ख़ैरात लें और उसे ग़रीबों में तक़सीम करें। नबी ﷺ के बरकत वाले हाथों से ख़ैरात का यह अमल मोमिनों को पाक और बुलंद करने का ज़रिया था। नेक सहाबा का दस्तूर था कि वे अपनी ख़ैरात नबी ﷺ के ज़रिए तक़सीम करवाते थे, और मुसलमान आज भी इस पर अमल करते हैं — वे अपने नेक आमाल का सवाब नबी ﷺ को हदिया करते हैं, जिसके बाद वह दूसरों तक पहुँचाया जाता है। यह इस बात पर भी रौशनी डालता है कि हर मोमिन अपनी रूहानी बुलंदी के लिए नबी ﷺ पर मुकम्मल भरोसा रखता है।
पंजाब जैसे कुछ इलाक़ों में आम रिवाज है कि लोग क़ुरआन की आयात पढ़कर उसका सवाब किसी ख़ास बुज़ुर्ग को हदिया करते हैं, और पूछते हैं कि क्या यह सवाब दूसरों तक पहुँचाया जा सकता है। इस रिवाज की जवाज़ की दलील इसी आयत से मिलती है, जो दिखाती है कि नबी ﷺ की शफ़ाअत और सवाब का पहुँचाना दोनों जायज़ और फ़ायदेमंद हैं।
यह आयत सिखाती है कि पाकी नबी ﷺ की बरकत वाली तवज्जो से हासिल होती है। ग़रीबों को ख़ैरात देना सिर्फ़ सख़ावत नहीं थी, बल्कि नबी ﷺ की नेक तवज्जो हासिल करने का ज़रिया था, जो रूहानी तहारत की तरफ़ ले जाती है। अल्लाह तआला नबी ﷺ की दुआओं के ज़रिए अपने बंदों पर नेमतें नाज़िल करता है। यह दिखाता है कि मोमिनों की तहारत और बुलंदी में नबी ﷺ की शफ़ाअत और दुआएँ बुनियादी किरदार अदा करती हैं।
आयत इस बात पर भी रौशनी डालती है कि नबी ﷺ की दुआएँ मोमिनों के लिए सुकून का सबब हैं। यह सिर्फ़ उनकी जिस्मानी भलाई की तरफ़ इशारा नहीं, बल्कि उनकी रूहानी इत्मिनान की भी तरफ़ है। नबी ﷺ की बरकत वाली शख्सियत हर मोमिन के लिए सुकून और दिली सुकून का ज़रिया है।
नबी ﷺ की भरपूर दुआएँ मोमिन को दिल का सुकून और इत्मिनान देती हैं। यह आयत दिखाती है कि नबी ﷺ की दुआएँ मोमिनों के लिए अल्लाह की रहमत हासिल करने का ज़रिया हैं और रूहानी सुकून का ज़रूरी ज़रिया हैं। यह याद दिलाता है कि नबी ﷺ की शफ़ाअत मोमिनों के दिलों के लिए सुकून और शिफ़ा का ज़रिया है।
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