कुरान - 9:129 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

129
فَإِن تَوَلَّوۡاْ فَقُلۡ حَسۡبِيَ ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَۖ عَلَيۡهِ تَوَكَّلۡتُۖ وَهُوَ رَبُّ ٱلۡعَرۡشِ ٱلۡعَظِيمِ,

Transliteration: (Fa in tawallaw faqul hasbiyal laahu laaa ilaaha illaa Huwa 'alaihi tawakkkaltu wa Huwa Rabbul 'Arshil 'Azeem)

फिर अगर वे मुँह फेरें, तो कह दो: "मेरे लिए अल्लाह काफ़ी [366] है। उसके सिवा कोई माबूद नहीं। मैंने उसी पर भरोसा किया, और वही अज़ीम अर्श [367] का मालिक है।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 129 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 129 की तफ़्सीर

✅ [366] नबी ﷺ के लिए अल्लाह का काफ़ी होना

यह आयत नबी करीम ﷺ को हुक्म देती है कि वे ऐलान करें कि अल्लाह अकेला उनके लिए काफ़ी है, चाहे लोग क़बूल करें या मुँह फेरें। पाक नबी ﷺ अल्लाह की सिफ़ात का सबसे बड़ा और सबसे मुकम्मल अक्स हैं, और उनका अल्लाह पर मुकम्मल भरोसा सब मोमिनों के लिए मिसाल है। यह ऐलान सिर्फ़ अल्लाह पर ख़ालिस इबादत, भरोसा और यक़ीन की तस्दीक़ करता है।

✅ [367] इलाही अज़मत की तस्दीक़ और नबी ﷺ की तारीफ़

इस आख़िरी आयत में इलाही हुकूमत की तस्दीक़ है — अल्लाह अज़ीम अर्श का मालिक है, तमाम मामलात का निगरान। उलेमा के मुताबिक़ यह आयत और इससे पहले की आयात नबी करीम ﷺ के मीलाद (पैदाइश और सिफ़ात) को भी बयान करती हैं, जो उनकी बुलंद ख़ूबियों और इलाही मिशन को उजागर करती हैं।

पहले के नबियों ने भी अपनी पैदाइश और मिशन का जश्न मनाया, जिससे मीलाद नबियों की सुन्नत बन गई। यह आख़िरी आयत अल्लाह की हम्द, मुकम्मल भरोसे और इस तरह उस नबी ﷺ की अज़मत की तरफ़ इशारों में तस्दीक़ करती है, जिन्हें इज़्ज़त और अज़मत के मालिक की तरफ़ से सरफ़राज़ और थामा हुआ है।

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