कुरान - 9:124 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

124
وَإِذَا مَآ أُنزِلَتۡ سُورَةٞ فَمِنۡهُم مَّن يَقُولُ أَيُّكُمۡ زَادَتۡهُ هَٰذِهِۦٓ إِيمَٰنٗاۚ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ فَزَادَتۡهُمۡ إِيمَٰنٗا وَهُمۡ يَسۡتَبۡشِرُونَ,

Transliteration: (Wa izaa maaa unzilat Sooratun faminhum mai yaqoolu aiyukum zaadat hu haazihee eemaanaa; fa ammal lazeena aamanoo fazaadat hum eemaananw wa hum yastabshiroon)

और जब कोई सूरा नाज़िल होती है, तो उनमें से कुछ कहते हैं: "तुममें से किसका ईमान बढ़ा [354]?" जो लोग ईमान वाले हैं, उससे उनका ईमान बढ़ता [355] है, और वे ख़ुश [356] होते हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 124 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 124 की तफ़्सीर

✅ [354] मुनाफ़िक़ों का मज़ाक़

यह उन मुनाफ़िक़ों की तरफ़ इशारा है जो सूरा नाज़िल होने पर तंज़-ओ-तरन्नुम से दूसरों से पूछते थे: "तुममें से किसका ईमान बढ़ा?" यह सवाल सच्चाई से नहीं, बल्कि मज़ाक़ के तौर पर पूछा जाता था — आयात और उन पर ईमान लाने वालों का मज़ाक़ उड़ाने की नीयत से। यह उस आयत के उलट है: "और जब उन पर उसकी आयात पढ़ी जाती हैं, तो उनका ईमान बढ़ जाता है" (सूरा अल-अनफ़ाल 8:2), जो मोमिनों के सच्चे रुजहान को बयान करती है।

✅ [355] ईमान का बढ़ना

यहाँ जिस ईमान के बढ़ने का ज़िक्र है, वह या तो रूहानी हालत में इज़ाफ़ा है या तफ़सीली ईमान में वुसअत। जबकि बुनियादी (इजमाली) यक़ीन सब मोमिनों में मश्तरक है, नई आयात या सूरों के नाज़िल होने से मोमिनों की तफ़सीली समझ और यक़ीन बढ़ता है, जिससे उनका ताल्लुक़ और गहरा और उनका एहसास मज़बूत होता है।

✅ [356] नाज़िल होने पर ख़ुशी

मोमिन क़ुरआनी आयात के नाज़िल होने पर ख़ुश होते हैं, क्योंकि उनमें पेशनगोइयाँ, ख़ुशख़बरियाँ, इलाही हिदायत और रूहानी रौशनी होती है। यह ख़ुशी अलग-अलग सूरतों में देखी जाती है — जैसे किसी बच्चे के सूरा अल-अलक़ की पहली तिलावत पर जश्न मनाना, जो ज़ाहिरी ख़ुशी और फ़रावान दान लाता है। ऐसे आमाल इलाही कलाम पाने पर दिल की क़ुदरती ख़ुशी की झलक हैं, जो सच्चे ईमान की निशानियों में से एक है।

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