कुरान - 9:126 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

126
أَوَلَا يَرَوۡنَ أَنَّهُمۡ يُفۡتَنُونَ فِي كُلِّ عَامٖ مَّرَّةً أَوۡ مَرَّتَيۡنِ ثُمَّ لَا يَتُوبُونَ وَلَا هُمۡ يَذَّكَّرُونَ,

Transliteration: ('A wa laa yarawna annahum yuftanoona fee kulli 'aamin marratan 'aw marrataini thumma laa yatooboona wa laa hum yazzakkaroon)

क्या वे देखते नहीं कि उनकी हर साल एक-दो बार आज़माइश [360] होती है? फिर भी वे न तौबा करते हैं और न सबक़ लेते हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 126 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 126 की तफ़्सीर

✅ [360] आज़माइशें और उनका मक़सद

यह आयत बार-बार होने वाली आज़माइशों की तरफ़ इशारा करती है — जैसे बीमारियाँ, काल और आफ़तें — जो हर साल एक-दो बार इलाही इम्तिहान की सूरत में आती हैं। सच्चा मोमिन ऐसी मुश्किलों को चेतावनी या याद दहानी समझता है, और उन पर ग़ौर करता है कि या तो वे गुनाहों की सज़ा हैं या सब्र और ईमान के इम्तिहान।

इसके उलट काफ़िर इन वाक़ियों को सिर्फ़ ज़माने की आफ़तें या माली नुक़सान समझते हैं, और उनके पीछे का रूहानी पैग़ाम देखने में नाकाम रहते हैं। इसलिए इन आज़माइशों के बावजूद वे न तौबा करते हैं और न सबक़ लेते हैं, और मुसीबत के असली मक़सद से अंधे रहते हैं।

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