Transliteration: (Laqad jaaa'akum Rasoolum min anfusikum 'azeezun 'alaihi maa 'anittum hareesun 'alaikum bilmu'mineena ra'oofur raheem)
इस आयत के इस हिस्से से कई मायने निकलते हैं:
अगर "अज़ीज़" पर ग़ौर किया जाए, तो मायना यह होता है कि नबी ﷺ मोमिनों को उनकी जान से भी ज़्यादा प्यारे हैं, और उनके गुनाह उनकी रहमत और शफ़ाअत के सुपुर्द हैं।
कुछ क़िराअतों में "अन्फ़ुसिकुम" के हरकात अलग हैं, जो बताते हैं कि नबी ﷺ सबसे आला नस्ल के लोगों में से उठाए गए — क़ुरैशी, हाशमी, मुत्तलिबी — जिनके बुज़ुर्ग पाक और ईमान वाले थे। इसी तरह उनकी उम्मत सबसे बेहतरीन उम्मत है, उनके माँ-बाप दूसरे नबियों के माँ-बाप से अफ़ज़ल हैं, और उनका ठिकाना मदीना मुनव्वरा सबसे पाक शहर है।
ख़ुलासा यह कि रसूल ﷺ अज़मत और कमाल का मुजस्समा हैं। हालाँकि वे मक्का में पैदा हुए और मदीना में बसे, उनकी रूहानी मौजूदगी हर मोमिन के दिल में ज़िंदा है। जैसे सूरज चौथे आसमान में रहता है, मगर उसकी रौशनी पूरी कायनात पर पड़ती है, वैसे ही नबी ﷺ का आम फ़ायदा सब तक पहुँचता है — हालाँकि ईमान सिर्फ़ मोमिनों के दिलों में क़रार पकड़ता है। उनकी रौशनी रूहानियत की काश्तकारी करती है, दिलों की परवरिश करती है और रूहों को बुलंद करती है — जैसे सूरज बीजों को ज़िंदगी और जवाहरात को चमक देता है।
हालाँकि नबी ﷺ अब जिस्मानी तौर पर नज़र नहीं आते, उनकी मौजूदगी हमेशा रहने वाली है। जैसे सूरज डूब जाए, मगर क़ायम रहता है, वैसे ही नबी ﷺ की बरकत वाली मौजूदगी हमेशा जारी रहती है।
नबी ﷺ अपने पैरवीकारों के दर्द और तकलीफ़ से गहरे मुतास्सिर होते हैं। उनका बरकत वाला दिल उनकी मुश्किलों का बोझ उठाता है। यह आगाही लम्हा-भर की नहीं — यह हमेशा की है, जैसी उनकी हमेशा रहने वाली रहमत और नबुव्वती रौशनी।
दूसरे लोग अपने बच्चों की कितनी ही परवाह करें, नबी ﷺ अपनी पूरी उम्मत की हिदायत, भलाई और नजात के लिए उससे भी ज़्यादा बेचैन रहते हैं। अपने पैरवीकारों की रूहानी और दुनियावी भलाई के लिए उनकी सख़्त ख्वाहिश दुनिया की हर मुहब्बत से बढ़कर है, जो उन्हें मोमिनों का सबसे शफ़ीक़ रहनुमा और शफ़ीक़ बनाती है।
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