Transliteration: (Wa ammal lazeena fee quloobihim maradun fazaadat hum rijsan ilaa rijsihim wa maatoo wa hum kaafiroon)
इससे मुराद वे दिल हैं जो नबी करीम ﷺ, क़ुरआन और हदीस की मुहब्बत से ख़ाली हैं। ऐसे दिल रूहानी बीमारी के लिए कमज़ोर होते हैं और आख़िर में कुफ़्र की तरफ़ झुक जाते हैं। क़ुरआन पानी की तरह है — जैसे पानी ज़मीन में बीज को ज़िंदगी देता है, वैसे ही वह पाक दिल को ज़िंदा करता है, मगर जो दिल फ़ितरत से ख़राब है उसे पाक नहीं कर सकता। इसी तरह बारिश नालियों की बदबू बढ़ा देती है; क़ुरआन भी पहले से बीमार दिलों की नापाकी बढ़ा देता है।
जब नई आयात नाज़िल होती हैं, तो ख़राब दिल वाले उन्हें ऐसे ही रद्द करते हैं जैसे उन्होंने पहली आयात को रद्द किया था। यह लगातार इनकार नापाकी पर नापाकी बढ़ाने का सबब बनता है। तफ़्सीर रूहुल बयान के मुताबिक़ "रिज्स" (नापाकी) से मज़हनी (ज़हनी) या रूहानी नापाकी मुराद है, जबकि "नजस" से क़ुदरती या जिस्मानी नापाकी। कुछ मामले दोनों में आते हैं, जबकि कुछ सिर्फ़ एक में।
बुज़ुर्गों और उलेमा का कहना है कि जिस दिल में नबी करीम ﷺ की दुश्मनी भरी हो, उसे क़दीर ही इलाही हिदायत या तौबा का मौका मिलता है। ऐसा इंसान अक्सर कुफ़्र की हालत में मरता है। अल्लाह तआला तमाम दिलों को ऐसी नफ़रत से महफ़ूज़ रखे और उन्हें ईमान और नबी ﷺ की मुहब्बत की राह पर साबित-क़दम रखे।
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