कुरान - 9:127 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

127
وَإِذَا مَآ أُنزِلَتۡ سُورَةٞ نَّظَرَ بَعۡضُهُمۡ إِلَىٰ بَعۡضٍ هَلۡ يَرَىٰكُم مِّنۡ أَحَدٖ ثُمَّ ٱنصَرَفُواْۚ صَرَفَ ٱللَّهُ قُلُوبَهُم بِأَنَّهُمۡ قَوۡمٞ لَّا يَفۡقَهُونَ,

Transliteration: (Wa izaa maaa unzilat Sooratun nazara ba'duhum ilaa ba'din hal yaraakum min ahadin thumman sarafoo; sarafal laahu quloobahum bi annahum qawmul laa yafqahoon)

और जब उन पर कोई सूरा नाज़िल होती है, तो वे एक-दूसरे की तरफ़ देखने [361] लगते हैं, पूछते हैं: "क्या कोई तुम्हें देख रहा है?" फिर वे मुँह फेर लेते हैं। अल्लाह ने उनके दिलों को (हिदायत से) फेर दिया, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो समझते [362] नहीं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 127 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 127 की तफ़्सीर

✅ [361] वही का मज़ाक़ और उससे बचना

यह मुनाफ़िक़ों की तरफ़ इशारा है, जो सूरा नाज़िल होने की आवाज़ सुनकर एक-दूसरे की तरफ़ देखने लगते थे — या तो अपनी निगाहों से उसका मज़ाक़ उड़ाने के लिए, या महफ़िल से भागने का बहाना ढूँढने के लिए। दूसरा मतलब ज़्यादा मज़बूत है, क्योंकि यह इलाही कलाम की मौजूदगी में उनकी बेचैनी को दिखाता है। इससे समझा जाता है कि ज़िक्र की महफ़िलों से बचना या दीनी इज्तिमाओं के लिए नफ़रत दिखाना निफ़ाक़ की निशानी है।

✅ [362] रूहानी अंधेपन की वजह से दस्त-बरदारी

उनके लगातार इनकार और मज़ाक़ की वजह से अल्लाह ने उनके दिलों को हिदायत से फेर दिया। यह दस्त-बरदारी उनकी समझ और रूहानी हिस की कमी से पैदा हुई। यह यह भी दिखाता है कि जो शख़्स नबी करीम ﷺ की बरकत वाली बारगाह और हाज़िरी से कट जाता है, वह रूहानी जहालत और गुमराही की हालत में छोड़ दिया जाता है।

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