Transliteration: (Wa maa kaanal mu'minoona liyanfiroo kaaaffah; falaw laa nafara min kulli firqatim minhum taaa'ifatul liyatafaqqahoo fiddeeni wa liyunziroo qawmahum izaa raja'ooo ilaihim la'allahum yahzaroon)
इसका मतलब यह नहीं कि हर मोमिन को जिहाद या इल्म हासिल करने के लिए अपना घर छोड़ना पड़े। इससे समझा जाता है कि जिहाद में शिरकत और मुकम्मल दीनी इल्म हासिल करना दोनों फ़र्ज़-ए-किफ़ाया हैं — यानी अगर काफ़ी तादाद में लोग इसे अदा कर लें तो बाक़ी बरी हो जाते हैं।
आयत हुक्म देती है कि एक गिरोह निकले, जबकि दूसरा पीछे रहे। अगर किसी इलाक़े का एक भी इंसान मुकम्मल दीनी इल्म हासिल कर ले, तो बाक़ियों से फ़र्ज़ साक़ित हो जाता है। यह जमात की दीनी रहनुमाई के लिए इस्लामी इल्म को बरक़रार रखने की अहमियत पर ज़ोर देता है।
"ताकि वे समझ हासिल करें" का अल्फ़ाज़ तमाम दीनी उलूम में फ़िक़्ह (इस्लामी फ़िक़ह) के बुलंद मुक़ाम को ज़ाहिर करता है। आज बहुत से लोग सही क़ानूनी जानकारी के बगै़र क़ुरआन के ग़ैर-यक़ीनी तर्जमों पर भरोसा करके इससे ग़ाफ़िल हैं। मगर बुनियादी दीनी इल्म — जैसे पाकी, नमाज़, रोज़े वग़ैरह के अहकाम — हर मुस्लिम मर्द और औरत पर फ़र्ज़ है। ताजिरों को कारोबार के अहकाम सीखने चाहिए, और मुलाज़िमों को काम से मुताल्लिक़ क़ानून समझने चाहिए। हज़रत इमाम शाफ़ई (रह.) ने फ़रमाया: "इल्म हासिल करना नफ़्ली नमाज़ से बेहतर है।"
यह आयत दीनी दिफ़ा में अमली शिरकत और गहरे इल्मी ताल्लुक़ की ज़िम्मेदारियों के बीच ख़ूबसूरत तवाज़ुन पेश करती है, दोनों मुस्लिम उम्मत की रूहानी और अमली भलाई के लिए ज़रूरी हैं।
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