कुरान - 9:121 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

121
وَلَا يُنفِقُونَ نَفَقَةٗ صَغِيرَةٗ وَلَا كَبِيرَةٗ وَلَا يَقۡطَعُونَ وَادِيًا إِلَّا كُتِبَ لَهُمۡ لِيَجۡزِيَهُمُ ٱللَّهُ أَحۡسَنَ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ,

Transliteration: (Wa laa yunfiqoona nafa qatan sagheeratanw wa laa kabeeratanw wa laa yaqta'oona waadiyan illaa kutiba lahum liyajziyahumul laahu ahsana maa kaanoo ya'maloon)

और वे जो कुछ ख़र्च करते हैं, छोटा हो या बड़ा [345], और जो वादी (घाटी) वे पार करते हैं [346], वह सब उनके लिए लिखा जाता है, ताकि अल्लाह उन्हें उनके बेहतरीन आमाल का बदला दे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 121 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 121 की तफ़्सीर

✅ [345] छोटी और बड़ी ख़ैरात

यह आयत मान्यता देती है कि हर ख़र्च, चाहे कितना ही छोटा या बड़ा हो, अल्लाह के नज़दीक दर्ज होता है। छोटे ख़र्च की मिसाल हज़रत अली मुर्तज़ा (रज़ि.) की वह दान है जो उन्होंने ग़ज़वा-ए-तबूक के दौरान चंद खजूरों की दी, जबकि बड़ा ख़र्च हज़रत उस्मान ग़नी (रज़ि.) ने किया जिन्होंने नौ सौ ऊँट दिए। दोनों क़िस्म की दान क़बूल और सवाब वाली है, क्योंकि इबादत का जौहर सच्ची नीयत है।

✅ [346] वादियों का पार करना इबादत है

चाहे कोई मुस्लमानों के इलाक़े की वादी पार करे या दुश्मन के इलाक़े की, वह अल्लाह की राह में शुमार होता है। इस्लामी सिपाही का पूरा सफ़र — हर क़दम, हर वादी और हर हरकत — इबादत का अमल माना जाता है। यह आयत इस बात को पुख़्ता करती है कि कोई चीज़ अनदेखी नहीं रहती, और अल्लाह के लिए किया गया हर अमल हमेशा के अज्र के लिए महफ़ूज़ रखा जाता है।

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