कुरान - 9:120 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

120
مَا كَانَ لِأَهۡلِ ٱلۡمَدِينَةِ وَمَنۡ حَوۡلَهُم مِّنَ ٱلۡأَعۡرَابِ أَن يَتَخَلَّفُواْ عَن رَّسُولِ ٱللَّهِ وَلَا يَرۡغَبُواْ بِأَنفُسِهِمۡ عَن نَّفۡسِهِۦۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ لَا يُصِيبُهُمۡ ظَمَأٞ وَلَا نَصَبٞ وَلَا مَخۡمَصَةٞ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ وَلَا يَطَـُٔونَ مَوۡطِئٗا يَغِيظُ ٱلۡكُفَّارَ وَلَا يَنَالُونَ مِنۡ عَدُوّٖ نَّيۡلًا إِلَّا كُتِبَ لَهُم بِهِۦ عَمَلٞ صَٰلِحٌۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجۡرَ ٱلۡمُحۡسِنِينَ,

Transliteration: (Maa kaana li ahlil Madeenati wa man hawlahum minal A'raabi ai yatakhallafoo 'ar-Rasoolil laahi wa laa yarghaboo bi anfusihim 'an nafsih; zaalika bi annahum laa yuseebuhum zama unw wa laa nasabunw wa laa makhmasatun fee sabeelil laahi wa laa yata'oona mawti'ai yagheezul kuffaara wa laa yanaaloona min 'aduwwin nailan illaa kutiba lahum bihee 'amalun saalih; innal laaha laa yudee'u ajral muhsineen)

मदीना वालों [336] और उनके इर्द-गिर्द वालों [337] को रसूल अल्लाह से पीछे बैठे रहना शोभा न देता था, और न यह कि वे अपनी जान को उनकी जान से ज़्यादा अज़ीज़ समझें। यह इसलिए कि अल्लाह की राह में उन्हें जो भी प्यास, तकलीफ़ या भूख [340] पहुँचती है, या वे किसी ऐसी जगह क़दम रखते हैं जो काफ़िरों को ग़ुस्सा [341] दिलाए, इन सब चीज़ों [342] के बदले उनके लिए नेकी [343] लिखी जाती है। बेशक अल्लाह नेकी करने वालों का अज्र ज़ाया नहीं करता [344]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 120 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 120 की तफ़्सीर

✅ [336] मदीना वालों का मतलब

मदीना के बाशिंदों में मुहाजिरीन और अंसार दोनों शामिल हैं। इससे दो हुक्म निकलते हैं:

  • जो लोग मदीना हिजरत करके सच्चे ईमान के साथ वहाँ रहते हैं, वे मदीना वालों में शुमार होते हैं।
  • अगर कोई ग़रीब मुसलमान हज करे तो हज सही है, क्योंकि मक्का पहुँचने पर वह वहाँ का बाशिंदा बन जाता है, और मक्की के लिए हज की शर्त मालदारी नहीं है।

✅ [337] तबूक की मुहिम में शिरकत की फ़र्ज़ियत

यह ग़ज़वा-ए-तबूक के वक़्त की तरफ़ इशारा है, जब मदीना के हर बाशिंदे — चाहे मुहाजिर हो या अंसार — पर नबी करीम ﷺ के साथ सफ़र में शिरकत करना फ़र्ज़ था।

✅ [338] फ़र्ज़ से मुस्तसना लोग

छूट सिर्फ़ उन लोगों को थी जिनके पास जायज़ वजहें थीं — जैसे बुढ़ापा, बीमारी, बचपन, या जब नबी करीम ﷺ ख़ुद किसी को अपना नाइब बनाकर रोक लें। मिसाल के तौर पर हज़रत उस्मान (रज़ि.) ग़ज़वा-ए-बद्र से महरूम रहे, और तबूक में हज़रत अली (रज़ि.) को नबी ﷺ के हुक्म से पीछे रखा गया।

✅ [339] नबी ﷺ को मुक़द्दम रखने का फ़र्ज़

उनके लिए नबी करीम ﷺ के लिए अपनी जान क़ुर्बान करना फ़र्ज़ था, जैसे परवाना शमा पर क़ुर्बान होता है। किसी को भी अपना आराम उनकी हिफ़ाज़त से बढ़कर नहीं समझना चाहिए था।

✅ [340] अल्लाह की राह के आमाल

इसमें जिहाद, रोज़े, हज और इल्म हासिल करने के सफ़र शामिल हैं, मगर इस सियाक़ में साफ़ तौर पर जिहाद मुराद है। अल्लाह की राह में उठाया गया हर कष्ट — प्यास, भूख या थकान — रूहानी तौर पर शुमार होता है।

✅ [341] काफ़िरों को ग़ुस्सा दिलाना

इससे मुराद फ़ातेह की हैसियत से काफ़िरों के इलाक़े में दाख़िल होना है, जिससे उनके दिल जलते हैं। यह सिखाता है कि जैसे अल्लाह के नेक लोगों को ख़ुश करना इबादत है, वैसे ही उसके दुश्मनों को नाराज़ करना भी सवाब का काम है।

✅ [342] इबादत में शामिल आमाल

इसमें दुश्मन को ज़ख़्मी करना, उन्हें क़ैद करना, उनका माल-ए-ग़नीमत हासिल करना वग़ैरह शामिल है। ये सब अल्लाह की राह में इबादत माने जाते हैं।

✅ [343] हर क़दम का अज्र

मुस्लिम सिपाही का हर अमल इबादत के तौर पर शुमार होता है। हदीस के मुताबिक़ अल्लाह की रहमत से उम्मीद है कि यही अज्र उन लोगों को भी मिलेगा जो हज या इल्म के लिए सफ़र करते हैं, क्योंकि ये भी अल्लाह की राह के सफ़र हैं।

✅ [344] जिहाद सबसे अफ़ज़ल इबादत है

यह आयत तस्दीक़ करती है कि जिहाद एक बुलंद इबादत है, और जो लोग इसमें शिरकत करते हैं, वे मोमिनों और ग़ैर-मोमिनों दोनों के मुहसिन हैं। उनका अज्र कभी ज़ाया नहीं होता, क्योंकि अल्लाह उसकी राह में की गई हर कोशिश की क़द्र करता है।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now