Transliteration: (Wa 'alas salaasatil lazeena khullifoo hattaaa izaa daaqat 'alaihimul ardu bimaa rahubat wa daaqat 'alaihim anfusuhum wa zannnooo al laa malja-a minal laahi illaaa ilaihi summa taaba 'alaihim liyatooboo; innal laaha Huwat Tawwaabur Raheem)
आयत हज़रत काब बिन मालिक, हज़रत हिलाल बिन उमय्या और हज़रत मुरारा बिन रबी (रज़ि.) की तरफ़ इशारा करती है। ये तीनों ग़ज़वा-ए-तबूक में शामिल नहीं हुए, मगर मुनाफ़िक़ों के उलट इन्होंने कोई झूठा बहाना नहीं बनाया। नबी ﷺ की वापसी पर इन्होंने खुलकर अपनी ख़ता क़बूल की। नतीजे में नबी करीम ﷺ ने इनके ख़िलाफ़ मुकम्मल सामाजिक बायकाट का हुक्म दिया। कोई इनसे बात न करे, न सलाम का जवाब दे; यहाँ तक कि उनकी बीवियों को भी अलग रहने का हुक्म दिया गया।
यह बायकाट इतना मुकम्मल था कि गोया वे समाज से मिटा दिए गए। पचास रातें वे इस अलगाव और अज़ाब की हालत में रहे। क़ुरआन इस दौर का ज़िक्र गहरे अंदरूनी इम्तिहान के लम्हे के तौर पर करता है, जो आख़िर में उनकी तौबा की क़ुबूलियत पर ख़त्म हुआ। आयत उनकी सच्चाई, सब्र और सच्ची तौबा की ताक़त को हमेशा के लिए अमर कर देती है।
हालाँकि ज़मीन बहुत कुशादा है, मगर इन तीनों सहाबा के लिए यह दम घोंटने वाली हो गई। अपने शहर मदीना में भी उन्हें सुकून और राहत की कोई जगह न मिली। उनका अलगाव सिर्फ़ सामाजिक नहीं — जज़्बाती और रूहानी भी था। मदीना, जो आम तौर पर मुहब्बत और आराम की जगह होती, नबी ﷺ की नाराज़गी की वजह से उन्हें बेगानी और सख़्त लगी। वे उस जगह नहीं ठहर सकते थे जहाँ अल्लाह का महबूब ﷺ उनसे राज़ी न हो।
यह इस बात पर रौशनी डालता है कि असली आराम जगह में नहीं, बल्कि नबी ﷺ की मंज़ूरी और अल्लाह की क़ुरबत में है। उस रूहानी ताल्लुक़ के बगै़र सबसे पाक ज़मीनें भी सुकून नहीं देतीं।
इन मोमिनों को अपनी ज़िंदगी से भी ऊब आ गई। जुर्म का बोझ, अलगाव के साथ मिलकर, उन्हें यह एहसास दिला रहा था कि अल्लाह के सिवा कोई पनाह नहीं। उनके पास कोई सहारा न था, न उनका ग़म सुनने वाला। इस मायूसी भरे एहसास ने उन्हें मुकम्मल सुर्पुदगी पर ला खड़ा किया — उन्हें इलाही रहमत के सिवा कोई निकल न मिला।
इस वाक़िये से तीन अहम सबक़ निकलते हैं:
आख़िर में, अल्लाह ने उन्हें उनकी अटल सच्चाई, उनके डटे हुए सब्र और उनकी रहमत पर बे-शर्त भरोसे की वजह से माफ़ किया। उनकी कहानी जुर्म, रूहानी नज़्म-ओ-ज़ब्त और दिली तौबा की आख़िरी क़ुबूलियत का हमेशा रहने वाला सबक़ है।
हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ, उनके पाक ख़ानदान और उनके नेक सहाबा पर बेहतरीन दुरूद और सलाम हों।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat