कुरान - 9:118 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

118
وَعَلَى ٱلثَّلَٰثَةِ ٱلَّذِينَ خُلِّفُواْ حَتَّىٰٓ إِذَا ضَاقَتۡ عَلَيۡهِمُ ٱلۡأَرۡضُ بِمَا رَحُبَتۡ وَضَاقَتۡ عَلَيۡهِمۡ أَنفُسُهُمۡ وَظَنُّوٓاْ أَن لَّا مَلۡجَأَ مِنَ ٱللَّهِ إِلَّآ إِلَيۡهِ ثُمَّ تَابَ عَلَيۡهِمۡ لِيَتُوبُوٓاْۚ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ,

Transliteration: (Wa 'alas salaasatil lazeena khullifoo hattaaa izaa daaqat 'alaihimul ardu bimaa rahubat wa daaqat 'alaihim anfusuhum wa zannnooo al laa malja-a minal laahi illaaa ilaihi summa taaba 'alaihim liyatooboo; innal laaha Huwat Tawwaabur Raheem)

और उन तीनों पर भी [रहमत की] जो पीछे छोड़ दिए गए [332], यहाँ तक कि ज़मीन अपनी वुसअत के बावजूद उन पर तंग हो गई [333], और वे अपनी जानों से ऊब गए [334], और उन्हें यक़ीन हो गया कि अल्लाह के सिवा कोई पनाहगाह नहीं। फिर उसने उन पर तवज्जो फ़रमाई ताकि उन्हें माफ़ करे, ताकि वे तौबा करते रहें। बेशक अल्लाह ही तौबा क़बूल करने वाला, मेहरबान है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 118 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 118 की तफ़्सीर

✅ [332] पीछे छोड़े गए तीन सच्चे मोमिन

आयत हज़रत काब बिन मालिक, हज़रत हिलाल बिन उमय्या और हज़रत मुरारा बिन रबी (रज़ि.) की तरफ़ इशारा करती है। ये तीनों ग़ज़वा-ए-तबूक में शामिल नहीं हुए, मगर मुनाफ़िक़ों के उलट इन्होंने कोई झूठा बहाना नहीं बनाया। नबी ﷺ की वापसी पर इन्होंने खुलकर अपनी ख़ता क़बूल की। नतीजे में नबी करीम ﷺ ने इनके ख़िलाफ़ मुकम्मल सामाजिक बायकाट का हुक्म दिया। कोई इनसे बात न करे, न सलाम का जवाब दे; यहाँ तक कि उनकी बीवियों को भी अलग रहने का हुक्म दिया गया।

यह बायकाट इतना मुकम्मल था कि गोया वे समाज से मिटा दिए गए। पचास रातें वे इस अलगाव और अज़ाब की हालत में रहे। क़ुरआन इस दौर का ज़िक्र गहरे अंदरूनी इम्तिहान के लम्हे के तौर पर करता है, जो आख़िर में उनकी तौबा की क़ुबूलियत पर ख़त्म हुआ। आयत उनकी सच्चाई, सब्र और सच्ची तौबा की ताक़त को हमेशा के लिए अमर कर देती है।

✅ [333] ज़मीन अपनी वुसअत के बावजूद तंग

हालाँकि ज़मीन बहुत कुशादा है, मगर इन तीनों सहाबा के लिए यह दम घोंटने वाली हो गई। अपने शहर मदीना में भी उन्हें सुकून और राहत की कोई जगह न मिली। उनका अलगाव सिर्फ़ सामाजिक नहीं — जज़्बाती और रूहानी भी था। मदीना, जो आम तौर पर मुहब्बत और आराम की जगह होती, नबी ﷺ की नाराज़गी की वजह से उन्हें बेगानी और सख़्त लगी। वे उस जगह नहीं ठहर सकते थे जहाँ अल्लाह का महबूब ﷺ उनसे राज़ी न हो।

यह इस बात पर रौशनी डालता है कि असली आराम जगह में नहीं, बल्कि नबी ﷺ की मंज़ूरी और अल्लाह की क़ुरबत में है। उस रूहानी ताल्लुक़ के बगै़र सबसे पाक ज़मीनें भी सुकून नहीं देतीं।

✅ [334] जुर्म का दर्द और सुकून का न होना

इन मोमिनों को अपनी ज़िंदगी से भी ऊब आ गई। जुर्म का बोझ, अलगाव के साथ मिलकर, उन्हें यह एहसास दिला रहा था कि अल्लाह के सिवा कोई पनाह नहीं। उनके पास कोई सहारा न था, न उनका ग़म सुनने वाला। इस मायूसी भरे एहसास ने उन्हें मुकम्मल सुर्पुदगी पर ला खड़ा किया — उन्हें इलाही रहमत के सिवा कोई निकल न मिला।

इस वाक़िये से तीन अहम सबक़ निकलते हैं:

  • इस्लाही तदबीर के तौर पर बायकाट: अस्थायी सामाजिक बायकाट रूहानी इस्लाह का ताक़तवर ज़रिया है। यह इलाही रिवाज पर आधारित है — हज़रत आदम (अलै.) ने भी इलाही दूरी की एक सूरत देखी। इसी तरह नबी ﷺ ने एक बार अपनी बीवियों से दूरी बनाई, जो दिखाता है कि ख़ामोशी और अलगाव ग़ौर और बेहतरी की तरफ़ ले जा सकता है। यह उसूल क़ुरआनी हिदायत (सूरा 4:24) से भी तायद शुदा है, जो इस्लाह के लिए अलगाव की नसीहत देती है।
  • दीनी मामलात में नबी ﷺ का इख़्तियार: यह वाक़िया नबी ﷺ का इलाही इख़्तियार दिखाता है। आम तौर पर सलाम का जवाब देना फ़र्ज़ है, और शादी-शुदा ताल्लुक़ जायज़ हैं। मगर इस इलाही रहनुमाई वाले बायकाट के दौरान हज़रत काब को सलाम करना या उनके साथ बीवी का रहना अस्थायी तौर पर मना हो गया — यह अल्लाह की मरज़ी से हलाल और हराम पर नबी ﷺ के मुकम्मल इख़्तियार को उजागर करता है।
  • मदीना एक रूहानी हालत है: मदीना सिर्फ़ एक जगह नहीं — यह नबी ﷺ की रज़ा का अक्स है। तबूक के दौरान बगै़र वजह मदीना में रहना जायज़ नहीं था, क्योंकि मुसलमानों की असली जगह मैदान-ए-जंग थी। यह सिखाता है कि मोमिन का दिल तभी मदीना बनता है जब नबी ﷺ राज़ी हों। वरना मदीना की मिट्टी भी कोई पनाहगाह नहीं देती।

आख़िर में, अल्लाह ने उन्हें उनकी अटल सच्चाई, उनके डटे हुए सब्र और उनकी रहमत पर बे-शर्त भरोसे की वजह से माफ़ किया। उनकी कहानी जुर्म, रूहानी नज़्म-ओ-ज़ब्त और दिली तौबा की आख़िरी क़ुबूलियत का हमेशा रहने वाला सबक़ है।

हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ, उनके पाक ख़ानदान और उनके नेक सहाबा पर बेहतरीन दुरूद और सलाम हों।

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