Transliteration: (Laqat taabal laahu 'alan nabiyyi wal Muhaajireena wal Ansaaril lazeenat taba'oohu fee saa'atil 'usrati min ba'di maa kaada yazeeghu quloobu fariqin minhum thumma taaba 'alaihim; innahoo bihim Ra'oofur Raheem)
"मुश्किल लम्हे" से मुराद ग़ज़वा-ए-तबूक है, जो मुश्किल और तकलीफ़ की जंग कहलाती है। इस मुहिम के दौरान ग़रीबी और कमी अपने आख़िरी दरजे पर थी — दस सहाबा बारी-बारी से एक ऊँट पर सवार होते थे, और कुछ लोग पूरे दिन सिर्फ़ एक खजूर पर गुज़ारा करते थे। इन हालात के बावजूद सिपाही नबी करीम ﷺ के साथ वफ़ादार और मज़बूत रहे।
हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.) ने नबी ﷺ से बारिश की दुआ की दरख़ास्त की। अल्लाह तआला ने दुआ क़बूल की और बारिश नाज़िल हुई, जिससे भरपूर पानी मिला।
यह आयत तस्दीक़ करती है कि ग़ज़वा-ए-तबूक में शिरकत करने वाले तमाम लोग यक़ीनी तौर पर जन्नत के लोग हैं। इसमें शक करना साफ़ इलाही तस्दीक़ को रद्द करना है।
कुछ दिल डर की वजह से लगभग मुड़ गए थे, मगर यह निफ़ाक़ या ईमान की कमज़ोरी की वजह से नहीं था। यह झिझक इंसानी फ़ितरत का क़ुदरती अमल था, न कि सरकशी या बेसब्री। उनकी वफ़ादारी बरक़रार रही, हालाँकि पल भर के लिए हिली ज़रूर थी।
अल्लाह तआला ने उनकी सच्चाई को मज़बूत करके और उनके साबित-क़दमी की हिफ़ाज़त करके उन पर तवज्जो फ़रमाई। इस इलाही रहमत ने नबी ﷺ के साथ उनका इत्तेहाद बरक़रार रखा और नेक लोगों में उनका मुक़ाम मुक़र्रर किया।
यह आयत एक अहम उसूल सिखाती है: गुनाह की सिर्फ़ नीयत — पूरे इरादे और अमल के बगै़र — गुनाह नहीं लिखी जाती। अल्लाह की रहमत सच्चे मोमिनों को अंदरूनी जद्दोजहद के लम्हों में भी ढाँप लेती है।
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