Transliteration: (Wa maa kaanal laahu liyudilla qawman ba'da iz hadaahum hatta yubaiyina lahum maa yattaqoon; innal laaha bikulli shai'in 'Aleem)
इसका मतलब यह नहीं कि अल्लाह किसी हिदायत-याफ़्ता इंसान को मनमाने तौर पर गुमराह कर देता है, बल्कि यह कि वह किसी को गुमराहों में तब शुमार करता है जब उसे साफ़ हिदायत और ज़िम्मेदारियाँ बता दी गई हों। इसमें हक़ और बातिल की वज़ाहत शामिल है।
इससे उलेमा ने यह नतीजा निकाला है कि जो लोग नबी करीम ﷺ की नबुव्वत से पहले वफ़ात पा गए और अल्लाह की वहदानियत पर सच्चा यक़ीन रखते थे — जैसे नबी ﷺ के माँ-बाप — वे गुमराह नहीं माने गए।
यह आयत बताती है कि नाबालिग़, पागल, या वे लोग जिन तक इस्लाम का पैग़ाम कभी नहीं पहुँचा, वे दीनी फ़राइज़ के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं।
साथ ही जो बालिग़ हैं और जिन तक साफ़ पैग़ाम नहीं पहुँचा, या जिन्होंने यह जाने बगै़र कि वे अमल मना हैं, किए हों, उन्हें उनकी सज़ा नहीं मिलेगी।
यह इलाही अदल के उसूल की तस्दीक़ करता है — कि किसी को क़ानून की साफ़ वज़ाहत के बगै़र सज़ा नहीं दी जाती। (रूहुल बयान, ख़ज़ाइनुल इरफ़ान)
जब मुशरिकों के लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत मना करने का हुक्म उतरा, तो कुछ मुसलमानों को डर हुआ कि कहीं उनकी पहले की — हुक्म आने से पहले की — ग़ैर-मुस्लिमों के लिए दुआएँ उनके ख़िलाफ़ न लिखी जाएँ।
इन चिंताओं को दूर करने के लिए यह आयत उतरी, जो उन्हें तसल्ली देती है कि अल्लाह किसी को तब तक ज़िम्मेदार नहीं ठहराता जब तक हिदायत साफ़ न कर दी जाए।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat