कुरान - 9:114 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

114
وَمَا كَانَ ٱسۡتِغۡفَارُ إِبۡرَٰهِيمَ لِأَبِيهِ إِلَّا عَن مَّوۡعِدَةٖ وَعَدَهَآ إِيَّاهُ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُۥٓ أَنَّهُۥ عَدُوّٞ لِّلَّهِ تَبَرَّأَ مِنۡهُۚ إِنَّ إِبۡرَٰهِيمَ لَأَوَّـٰهٌ حَلِيمٞ,

Transliteration: (Wa maa kaanas tighfaaru ibraaheema li abeehi illaa 'an maw'idatinw wa 'adahaaa iyyaahu falammaa tabaiyana lahooo annahoo 'aduwwul lillaahi tabarra a minh; inna Ibraaheema la awwaahun haleem)

और इबराहीम का अपने बाप के लिए मग़फ़िरत की दुआ करना सिर्फ़ उस वादे [319] की वजह से था जो उन्होंने उससे [320] किया था। मगर जब उन पर यह ज़ाहिर हो गया कि वह अल्लाह का दुश्मन [321] है, तो उन्होंने उससे बराअत [322] का इज़हार कर दिया। बेशक इबराहीम बड़े नरम दिल और बुर्दबार [323] थे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 114 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 114 की तफ़्सीर

✅ [319] शान-ए-नुज़ूल

यह आयत उस वाक़िये के जवाब में उतरी जब हज़रत अली (रज़ि.) ने एक शख़्स को अपने मुशरिक बाप के लिए मग़फ़िरत की दुआ करने से रोका। उस शख़्स ने दलील दी कि हज़रत इबराहीम (अलै.) ने अपने बाप के लिए ऐसा ही किया था। हज़रत अली (रज़ि.) ने नबी ﷺ को इसकी इत्तिला दी, और इस आयत ने साफ़ कर दिया कि हज़रत इबराहीम (अलै.) की दुआ की एक ख़ास वजह थी, और यह आम अमल के लिए मिसाल नहीं है। (तफ़्सीर ख़ज़ाइनुल इरफ़ान)

✅ [320] वादे की वज़ाहत

हज़रत इबराहीम (अलै.) ने अपने बाप (या चाचा) आज़ार से उस इलाही मुमानियत से पहले दुआ करने का वादा किया था। कुछ उलेमा कहते हैं कि यह वादा इस समझ पर किया गया था कि आज़ार आख़िर में ईमान ले आएगा। हालाँकि आज़ार ने अपना वादा पूरा नहीं किया, मगर हज़रत इबराहीम (अलै.) अपने वादे पर क़ायम रहे, यहाँ तक कि इलाही हिदायत ने हुक्म साफ़ कर दिया।

✅ [321] अल्लाह की दुश्मनी का एहसास

जब वही या साफ़ निशानियों से यह ज़ाहिर हो गया कि आज़ार कुफ़्र की हालत में मरने वाला है, तो हज़रत इबराहीम (अलै.) ने उसके लिए मग़फ़िरत की दुआ बंद कर दी। यह अपने जज़्बात को इलाही हुक्म के मुताबिक़ करने की अहमियत की मिसाल है।

✅ [322] दस्त-बरदारी और बराअत

हज़रत इबराहीम (अलै.) ने सिर्फ़ दुआ बंद नहीं की, बल्कि आज़ार के कुफ़्र से पूरी तरह बराअत (अलगाव) का इज़हार भी किया। यह तस्दीक़ करता है कि इस्लाम रिश्तेदारी की क़द्र करता है, मगर ईमान और अल्लाह के साथ वफ़ादारी की अहमियत ज़्यादा है। जज़्बाती रिश्ते दीनी उसूलों से समझौता नहीं करा सकते।

✅ [323] इबराहीम का किरदार — नरमी और सब्र

आज़ार ईमान का दुश्मन होते हुए भी हज़रत इबराहीम (अलै.) ने रहम, नरमी और बुर्दबारी का इज़हार किया, और बेहतरीन अख़्लाक़ी उसूल का मुजस्समा बने। जहाँ कुछ नबियों जैसे हज़रत नूह और मूसा (अलै.) की शख्सियत में रौब और अज़मत झलकती है, वहीं हज़रत इबराहीम (अलै.) के किरदार में इलाही रहमत झलकती है।

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