Transliteration: (Wa minal A'raabi mai yu'minu billaahi wal yawmil aakhiri wa yattakhizu maa yunfiqu qurubaatin 'indal laahi wa salawaatir Rasool; 'alaaa innahaa qurbatul lahum; sayudkhilu humul laahu fee rahmatih; innal laaha Ghafoorur Raheem (section 12))
इस आयत में गाँव के रहने वालों से मुराद शायद बनी मुज़ैना के लोग, या असलम, ग़िफ़ार और जुहैना क़बीले हैं। यह दिखाता है कि अल्लाह की रूहानी क़ुरबत नबी ﷺ से जिस्मानी क़ुरबत पर मुनहसिर नहीं है। अबू जहल नबी ﷺ के करीब मक्का में रहता था, मगर काफ़िर रहा, जबकि ये लोग दूर रहते हुए भी मोमिन, ख़ुदातरस और नेक बन गए। यह इस बात पर ज़ोर देता है कि असली चीज़ रूहानी क़ुरबत है, और नबी ﷺ से जिस्मानी क़ुरबत अकेले अल्लाह की नेमतें हासिल करने के लिए काफ़ी नहीं। अल्लाह का शुक्र है कि सिर्फ़ रूहानी क़ुरबत ही मक़बूल है।
यह आयत दो अहम नतीजों की तरफ़ ले जाती है:
यह आयत सिखाती है कि नेक कामों में अल्लाह तआला की रज़ा के साथ नबी ﷺ की रज़ा भी माँगना शिर्क नहीं है। अल्लाह के साथ नबी ﷺ को राज़ी करने की नीयत अल्लाह और उसके रसूल ﷺ दोनों की ताज़ीम है। अल्लाह तआला फ़रमाता है: "मगर अल्लाह और उसके रसूल का हक़ ज़्यादा है कि उसकी रज़ा चाही जाए" (सूरा 9:62)। नेक सहाबा ख़ैरात देते वक़्त अल्लाह की रज़ा के साथ नबी ﷺ की रज़ा की भी नीयत करते थे।
यह आयत "ईसाल-ए-सवाब" (नेक आमाल का सवाब मुरदों तक पहुँचाने) के रिवाज की भी दलील है — नबी करीम ﷺ के वसीले से। मिसाल के तौर पर सवाब पहुँचाते वक़्त यक़ीन होता है कि नबी ﷺ की शफ़ाअत से नेक आमाल का सवाब मुरदों की रूहों तक पहुँच सकता है। आज भी रिवाज है कि ख़ैरात लेने वाला दान करने वाले के लिए दुआ करता है, जैसा सहाबा करते थे।
आयत से मालूम होता है कि जो लोग अल्लाह और उसके रसूल ﷺ पर ईमान रखते हैं, उनकी ख़ैरात और नेक आमाल क़बूल होंगे। यह इस बात पर ज़ोर देता है कि मुसलमान नबी ﷺ के सहाबी के बुलंद मक़ाम तक नहीं पहुँच सकते। उनके आमाल सीधे अल्लाह के अर्श से क़बूल होते हैं। मगर हम आम मुसलमानों को नहीं मालूम कि हमारे आमाल अल्लाह तआला की बारगाह में क़बूल होंगे या नहीं — यह हमारे आमाल में अज्ज़त और सच्ची नीयत की अहमियत पर रौशनी डालता है।
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