Transliteration: (Al A'raabu ashaddu kufranw wa nifaaqanw wa ajdaru allaa ya'lamoo hudooda maaa anzalal laahu 'alaa Rasoolih; wallaahu 'Aleemun Hakeem)
यह आयत बताती है कि इल्म और हिकमत शहरों में गाँवों और दियारी (खानाबदोश) इलाक़ों की निस्बत ज़्यादा मिलती है, जहाँ दीनी अहकाम के बारे में जहालत और कम समझ पाई जाती है। आयत गाँवों के रहने वाले अरबों के इस रुजहान की तरफ़ इशारा करती है कि वे इस्लाम की तालीमात से ज़्यादा दूर रहते हैं, अक्सर उलेमा और सरचश्मों तक उनकी रसाई कम होती है। एक अरबी कहावत है: "इल्म शहरों में है और जहालत गाँवों में" — यह इस हक़ीक़त को दिखाती है कि शहर अपनी रौनक़ की वजह से इल्म तक ज़्यादा रसाई रखते हैं, जबकि गाँव और दियारी इलाक़ों में यह मौके कम होते हैं। ऐसे इलाक़ों में आम तौर पर उलेमा की सोहबत नहीं मिलती, जिसकी वजह से जहालत का इमकान ज़्यादा होता है।
आयत का यह हिस्सा बताता है कि ये गाँव के रहने वाले अरब उन हदों और हदूद से ज़्यादा बेख़बर रहते थे जो अल्लाह ने अपने रसूल ﷺ पर उतारे थे। यह जहालत उनके पास दीनी तालीमात की सही समझ और जानकारी न होने की वजह से थी, जो इल्म और हिदायत के सरचश्मों से दूर रहने का नतीजा है।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat