कुरान - 9:95 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

95
سَيَحۡلِفُونَ بِٱللَّهِ لَكُمۡ إِذَا ٱنقَلَبۡتُمۡ إِلَيۡهِمۡ لِتُعۡرِضُواْ عَنۡهُمۡۖ فَأَعۡرِضُواْ عَنۡهُمۡۖ إِنَّهُمۡ رِجۡسٞۖ وَمَأۡوَىٰهُمۡ جَهَنَّمُ جَزَآءَۢ بِمَا كَانُواْ يَكۡسِبُونَ,

Transliteration: (Sa yahlifoona billaahi lakum izanqalabtum ilaihim litu'ridoo 'anhum fa a'ridoo 'anhum innahum rijsunw wa ma'waahum jahannamu jazaaa'an bi maakaanoo yaksiboon)

जब तुम उनके पास लौटो [260] तो वे तुम्हारे सामने अल्लाह की क़समें खाएँगे ताकि तुम उनसे इराज़ [261] करो। तो तुम उनसे इराज़ करो [262]; बेशक वे नापाक [263] हैं, और उनका ठिकाना जहन्नम है, उसके बदले जो वे कमाते रहे [264]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 95 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 95 की तफ़्सीर

✅ [260] मुनाफ़िक़ों की ज़रूरत से ज़्यादा क़समें

यह आयत सिखाती है कि मुनाफ़िक़ और गुमराह लोग अक्सर यह साबित करने के लिए अल्लाह के नाम की ज़रूरत से ज़्यादा क़समें खाते हैं कि वे मुसलमान हैं। मगर सच्चे मोमिन को अपने ईमान की तस्दीक के लिए लगातार क़समें खाने की ज़रूरत नहीं होती। उनकी सच्चाई उनके आमाल और यक़ीन से ज़ाहिर होती है।

✅ [261] उनसे इराज़ करना

अल्लाह नबी ﷺ और मोमिनों को हुक्म देता है कि वे मुनाफ़िक़ों के झूठ का जवाब देकर या उनका निफ़ाक़ फ़ाश करके उनसे पेश न आएँ। उनके धोखे भरे अल्फ़ाज़ और आमाल में उलझने के बजाय उनसे मुँह मोड़ना बेहतर है।

✅ [262] सारे सामाजिक ताल्लुक़ात ख़त्म कर देना

इससे मुराद मुनाफ़िक़ों से हर क़िस्म के सामाजिक ताल्लुक़ात पूरी तरह ख़त्म करने का हुक्म है — बात करना, सलाम करना, मुलाक़ात, खाना-पीना और ताल्लुक़ात रखना सब बंद कर देना। नबी ﷺ ने मोमिनों को हुक्म दिया कि वे इनसे तमाम ताल्लुक़ काट लें, क्योंकि उनकी इस्लाह की कोई उम्मीद नहीं बची थी। यह निफ़ाक़ पर सख़्त नाराज़गी और नफ़रत की वजह से था, महज़ हिक़ारत से नहीं। यह सिखाता है कि हमें मुर्तद और गुमराह लोगों से दूरी बनाए रखनी चाहिए, जिन पर भरोसा नहीं किया जा सकता और जिनसे अच्छी नीयत से मेल-जोल नहीं रखा जा सकता।

✅ [263] मुनाफ़िक़ों की नापाकी

यह आयत यह भी बताती है कि मुनाफ़िक़ अब पाक नहीं हो सकते, क्योंकि उनकी नापाकी उनकी फ़ितरत में है, जिसे कोई पानी या पाकी की रस्म नहीं धो सकती। ऐसे लोगों को सिर्फ़ नबी ﷺ की बरकत वाली नज़र पाक कर सकती थी। अस्थायी नापाकियाँ दूर की जा सकती हैं, मगर निफ़ाक़ से पैदा होने वाली हमेशा की और फ़ितरी नापाकी दूर नहीं हो सकती।

✅ [264] शान-ए-नुज़ूल

यह आयत जद बिन क़ैस, मोतिब बिन क़शीर और उनके साथियों के सिलसिले में उतरी, जिनका मुक़ाता (नाता तोड़ना) मुक़र्रर कर दिया गया था। यह मशहूर मुनाफ़िक़ अब्दुल्लाह बिन उबई की तरफ़ इशारा भी हो सकता है, जिसने आइंदा जंगों में शिरकत की क़सम खाई थी, मगर उसके धोखेबाज़ मिज़ाज की वजह से अल्लाह और उसके रसूल ﷺ ने उसे नामंज़ूर कर दिया।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now