कुरान - 9:93 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

93
۞إِنَّمَا ٱلسَّبِيلُ عَلَى ٱلَّذِينَ يَسۡتَـٔۡذِنُونَكَ وَهُمۡ أَغۡنِيَآءُۚ رَضُواْ بِأَن يَكُونُواْ مَعَ ٱلۡخَوَالِفِ وَطَبَعَ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمۡ فَهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ,

Transliteration: (Innamas sabeelu 'alal lazeena yasta'zinoonaka wa hum aghniyaaa'; radoo biany-yakoonoo ma'al khawaalifi wa taba'al laahu 'alaa quloobihim fahum laa ya'lamoon)

गुनाह सिर्फ़ उन लोगों पर है जो अमीर [252] होते हुए आपसे इजाज़त माँगते हैं। उन्होंने औरतों [253] के साथ पीछे रह जाना पसंद किया, और अल्लाह ने उनके दिलों पर मुहर लगा दी, तो वे जानते नहीं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 93 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 93 की तफ़्सीर

✅ [252] जंग में शिरकत के लिए मालदारी की शर्त

यह आयत उन लोगों के बारे में है जिनके पास जंग में शिरकत के साधन थे, मगर उन्होंने शिरकत नहीं की। इनके पास सवारी के जानवर और जंगी साज़ो-सामान मौजूद था, जिससे वे जिहाद में शामिल हो सकते थे। यह मालदारी सफ़र वाली और घर से दूर लड़ी जाने वाली जंगों के लिए शर्त है। मगर अगर अपने ही मुल्क में जिहाद ज़रूरी हो जाए, तो यह ग़रीबों पर भी फ़र्ज़ हो जाता है, बशर्ते वे तंदुरुस्त हों और जंगी साज़ो-सामान मौजूद हो — चाहे वह उनका अपना हो या दूसरों से मिला हुआ।

✅ [253] औरतों पर जिहाद का हुक्म

यह आयत साफ़ करती है कि जिहाद औरतों पर फ़र्ज़ नहीं है, सिवाय उस सूरत के जब मैदान-ए-जंग में उनकी ख़ास ज़रूरत हो। उस हालत में उनके लिए शिरकत ज़रूरी हो जाती है। यह उस सूरत-ए-हाल को दिखाता है जब जंग में ख़ास ज़रूरतों की वजह से औरतों को बुलाया जा सकता है, मगर आम तौर पर जिहाद उन पर फ़र्ज़ नहीं है।

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