कुरान - 9:92 सूरह अत-तौबा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

92
وَلَا عَلَى ٱلَّذِينَ إِذَا مَآ أَتَوۡكَ لِتَحۡمِلَهُمۡ قُلۡتَ لَآ أَجِدُ مَآ أَحۡمِلُكُمۡ عَلَيۡهِ تَوَلَّواْ وَّأَعۡيُنُهُمۡ تَفِيضُ مِنَ ٱلدَّمۡعِ حَزَنًا أَلَّا يَجِدُواْ مَا يُنفِقُونَ,

Transliteration: (Wa laa 'alal lazeena izaa maaa atawka litahmilahum qulta laaa ajidu maaa ahmilukum 'alaihi tawallaw wa a'yunuhum tafeedu minaddam'i hazanan allaa yajidoo maa yunfiqoon (End Juz 10))

और न ही उन लोगों पर कोई इल्ज़ाम है जो आपके पास आए कि आप उनके लिए सवारी [249] का इंतज़ाम कर दें। आपने उनसे कहा: "मैं तुम्हें ले जाने का कोई साधन [250] नहीं पाता।" तो वे इस ग़म में लौट गए कि उनके पास ख़र्च करने को कुछ न था [251], उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अत-तौबा आयत 92 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अत-तौबा – आयत 92 की तफ़्सीर

✅ [249] नबी ﷺ से माँगना मोमिन के लिए इज़्ज़त है

इस आयत से दो अहम बातें निकलती हैं:

  • नबी करीम ﷺ से माँगना मोमिन के लिए असली इज़्ज़त है: नबी ﷺ से मदद माँगना शर्म की बात नहीं, बल्कि एक इज़्ज़त है। जिन सहाबा ने सवारी की दरख़ास्त की, उन्हें यह जानते हुए इज़्ज़त हासिल हुई कि नबी ﷺ अगर मुमकिन होता तो ज़रूर मदद करते।
  • नेकी न कर पाने पर अफ़सोस ज़ाहिर करना इबादत है: सहाबा को जंग में शिरकत न कर पाने का गहरा ग़म था। यह अफ़सोस और आँसू इबादत माने जाते हैं, जो सच्चाई और नेक काम की चाहत ज़ाहिर करते हैं, जो इस्लाम में बहुत कीमती है।

✅ [250] शान-ए-नुज़ूल

यह आयत तब उतरी जब कुछ सहाबा जंग में शिरकत की नीयत से नबी करीम ﷺ के पास आए और सवारी के जानवर माँगे। नबी ﷺ के पास कोई जानवर मौजूद न था, इसलिए आपने फ़रमाया: "मैं तुम्हें ले जाने का कोई साधन नहीं पाता।" यह सुनकर सहाबा शिरकत न कर पाने के ग़म में आँखों में आँसू भरकर लौट गए।

आयत साफ़ करती है कि जंग में उनकी ग़ैर-शिरकत पर उन्हें कोई मलामत नहीं होगी। "मेरे पास कुछ नहीं" कहना इनकार नहीं था, बल्कि एक उज़्र (बहाना) था। नबी ﷺ तमाम इलाही ख़ज़ानों के मालिक होते हुए भी यह अल्फ़ाज़ इसलिए इस्तेमाल किए कि उस वक़्त कोई फ़ौरी अमली हल मौजूद न था। अल्लाह तआला का पैग़ाम था कि वह और उसका रसूल उन्हें बरकतों से मालामाल करेंगे (सूरा 9:73)। यह सिखाता है कि नबी ﷺ को तमाम इलाही नेमतों पर मुख़्तार बनाया गया था, और ज़ाहिरी कमियाँ मोमिनों को उज़्र देने के लिए थीं।

✅ [251] ग़म और पशेमानी की क़द्र

इससे हम सीखते हैं कि ग़म ज़ाहिर करना, आँसू बहाना और नेकी न कर पाने पर पशेमान होना — सब इबादत है। इसी तरह गुनाह के बाद पशेमानी और रोना भी इबादत है। ये जज़्बात अल्लाह की मरज़ी से गहरा ताल्लुक़ और उसकी राह पर चलने की सच्ची चाहत दिखाते हैं।

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