Transliteration: (Wa laa 'alal lazeena izaa maaa atawka litahmilahum qulta laaa ajidu maaa ahmilukum 'alaihi tawallaw wa a'yunuhum tafeedu minaddam'i hazanan allaa yajidoo maa yunfiqoon (End Juz 10))
इस आयत से दो अहम बातें निकलती हैं:
यह आयत तब उतरी जब कुछ सहाबा जंग में शिरकत की नीयत से नबी करीम ﷺ के पास आए और सवारी के जानवर माँगे। नबी ﷺ के पास कोई जानवर मौजूद न था, इसलिए आपने फ़रमाया: "मैं तुम्हें ले जाने का कोई साधन नहीं पाता।" यह सुनकर सहाबा शिरकत न कर पाने के ग़म में आँखों में आँसू भरकर लौट गए।
आयत साफ़ करती है कि जंग में उनकी ग़ैर-शिरकत पर उन्हें कोई मलामत नहीं होगी। "मेरे पास कुछ नहीं" कहना इनकार नहीं था, बल्कि एक उज़्र (बहाना) था। नबी ﷺ तमाम इलाही ख़ज़ानों के मालिक होते हुए भी यह अल्फ़ाज़ इसलिए इस्तेमाल किए कि उस वक़्त कोई फ़ौरी अमली हल मौजूद न था। अल्लाह तआला का पैग़ाम था कि वह और उसका रसूल उन्हें बरकतों से मालामाल करेंगे (सूरा 9:73)। यह सिखाता है कि नबी ﷺ को तमाम इलाही नेमतों पर मुख़्तार बनाया गया था, और ज़ाहिरी कमियाँ मोमिनों को उज़्र देने के लिए थीं।
इससे हम सीखते हैं कि ग़म ज़ाहिर करना, आँसू बहाना और नेकी न कर पाने पर पशेमान होना — सब इबादत है। इसी तरह गुनाह के बाद पशेमानी और रोना भी इबादत है। ये जज़्बात अल्लाह की मरज़ी से गहरा ताल्लुक़ और उसकी राह पर चलने की सच्ची चाहत दिखाते हैं।
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