Transliteration: (Laisa 'alad du'aafaaa'i wa laa 'alal mardaa wa laa 'alal lazeena laa yajidoona maa yunfiqoona harajun izaa nasahoo lillaahi wa Rasoolih; maa 'alal muhsineena min sabeel; wallaahu Ghafoorur Raheem)
यह आयत उन सच्चे असमर्थ लोगों के बारे में है जो जंग में शिरकत नहीं कर सके। वे तीन क़िस्म के हैं: बूढ़े, बीमार और वे जिनके पास ज़रूरी साज़ो-सामान नहीं था। यह बताता है कि इन तीन गिरोहों के लिए जंग का सफ़र फ़र्ज़ नहीं था, क्योंकि उनकी जिस्मानी या माली मजबूरियों ने उन्हें जिहाद में शिरकत से रोका।
कुछ बेसहारा सहाबा, जिनके पास सवारी के जानवर नहीं थे, उन्होंने नबी करीम ﷺ से दरख़ास्त की कि उन्हें सवारी दी जाए ताकि वे जिहाद में शिरकत कर सकें। मगर अतिरिक्त जानवरों की कमी की वजह से उनकी दरख़ास्त ठुकरा दी गई, जिससे वे आँसू बहाने लगे। इसी हालत में यह आयत उतरी।
इससे कई अहम बातें निकलती हैं:
यह आयत इस बात पर ज़ोर देती है कि नबी करीम ﷺ के लिए सच्चा होना अल्लाह तआला के लिए सच्चा होने के बराबर है। और अगर कोई अपनी मजबूरी की वजह से नेक काम नहीं कर सकता, मगर दिल से नेक लोगों का सच्चा हमदर्द हो, तो अल्लाह चाहे तो उसे भी नेक लोगों में शुमार करेगा। इस आयत का मक़सद यह बताना है कि जो मजबूर मुसलमान जंग में शिरकत नहीं कर सके, उन्हें मदीना मुनव्वरा में रहकर मुस्लिम मुजाहिदों के बच्चों की ख़िदमत करनी चाहिए, ताकि अल्लाह और उसके नबी ﷺ के लिए अपनी सच्चाई ज़ाहिर करें।
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