Transliteration: (Wa jaaa'al mu'az ziroona minal A'raabi liyu'zana lahum wa qa'adal lazeena kazabul laaha wa Rasoolah; sayuseebul lazeena kafaroo minhum 'azaabun aleem)
इससे मुराद अमीर बिन तुफ़ैल और उसके साथियों के लोग हैं, जो ग़ज़वा-ए-तबूक के मौके पर नबी करीम ﷺ के पास आए। उन्होंने कहा कि अगर वे रसूल ﷺ के साथ चलेंगे तो ताई क़बीले के लोग उनके घर लूट लेंगे। नबी ﷺ ने जवाब दिया कि अल्लाह उन्हें उनसे बेनियाज़ कर देगा, और अल्लाह ने उन्हें उनकी असल हालत पहले ही बता दी है। इन लोगों ने नबी करीम ﷺ से झूठ बोला, झूठे बहानों के ज़रिए जिहाद में शिरकत करने से बचने की कोशिश की।
इससे हमें सीख मिलती है कि नबी करीम ﷺ से झूठ बोलना अल्लाह तआला से झूठ बोलने के बराबर है। जिन मुनाफ़िक़ों ने नबी ﷺ से झूठ बोला, उन्हें अल्लाह से झूठ बोलने वाला ही माना गया, जैसा इस आयत में बयान हुआ। उनका धोखा गंभीर रूहानी अंजाम का कारण बना, क्योंकि उन्होंने हक़ को क़ायम नहीं रखा।
यह आयत साफ़ करती है कि मुनाफ़िक़ों में से जो लोग खुलकर काफ़िर हो जाएँगे, उन्हें दुनिया में मौत और तबाही मिलेगी। और जो मौत तक काफ़िर रहे, उन्हें आख़िरत में दर्दनाक अज़ाब मिलेगा। आयत इस बात पर ज़ोर देती है कि हर मुनाफ़िक़, चाहे उसने अपना कुफ़्र खुलकर ज़ाहिर न किया हो, अंदर से काफ़िर था। इसलिए उनका अज़ाब ज़रूरी है — चाहे दुनिया में हो या आख़िरत में।
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