Transliteration: (Laakinir Rasoolu wal lazeena aamanoo ma'ahoo jaahadoo bi amwaalihim wa anfusihim; wa ulaaa'ika lahumul khairaatu wa ulaaa'ika humul muflihoon)
यह आयत बताती है कि नबी करीम ﷺ का ईमान हर किसी के ईमान से बेहतर और आला है, क्योंकि वह पैदाइश से भी पहले क़ायम था।
यहाँ वक़्त और हालत की बंदिश इस बात पर ज़ोर देती है कि जो लोग नबी ﷺ के साथ ईमान लाए, वे जोश और सच्चाई के साथ लाए, जैसा नबी ﷺ ने ईमान लाया। जैसे बिलक़ीस ने कहा: "और मैंने हज़रत सुलेमान के साथ ईमान लाया" — इसी तरह नबी ﷺ ही ईमान की सच्ची कसौटी हैं। जिसका ईमान उनके मुताबिक़ होगा वह दुरुस्त माना जाएगा, और जो उनके ख़िलाफ़ होगा वह झूठा।
यहाँ "नेकियाँ" से दुनिया, क़ब्र और आख़िरत की भलाइयाँ और फ़ायदे मुराद हैं। इससे समझा जाता है कि मुस्लिम मुजाहिद के माल और आमाल में बरकत होती है, और ऐसे लोग क़ब्र के सवाल-जवाब और अज़ाब, मौत के ख़ौफ़ और सख़्ती से महफ़ूज़ रहते हैं, और आख़िरत में बुलंद दर्जा पाते हैं।
हज़रत ज़ुबैर बिन अव्वाम (रज़ि.) का माल इसकी मिसाल है। उनकी शहादत के बाद उनकी वसीयत सिर्फ़ उनके माल के एक तिहाई से पूरी हुई, और उनकी जायदाद का आठवाँ हिस्सा उनकी चार बीवियों में बाँटा गया — हर एक को दो लाख सिक्के मिले। यह उन लोगों के माल और आमाल की बरकत दिखाता है जो अल्लाह की राह में जद्दोजहद करते हैं।
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